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“बीबी की मदद से उसकी सहेली की चुदाई”

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“वाह री…. मेरी शेरनी …. नीचे दबी हुई है, चुदनें की पूरी तैयारी है …. फिर मुझसे काहे की शरम है…. मुझे भी तो यही चोदता है…. अब छोड़ शरम !”
अरे राम रे …. नहीं कर ना …. उह्ह्ह्ह्…. जुली जा ना …. आईईईईइ…. घुस गया राम जी”
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मोनिका मेरी पड़ोसन थी| मेरी पत्नी जुली से उसकी अच्छी दोस्ती थी| शाम को अक्सर वो दोनों खूब बतियाती थी| दोनों एक दूसरे के पतियों के बारे में कह सुनकर खिलखिला कर हंसती थी| मुझे भी मोनिका बहुत अच्छी लगती थी| मैं अक्सर अपनी खिड़की से उसे झांक कर देखा करता था| उसके कंटीले नयन, मेरे को चीर जाते थे| उसकी बड़ी बड़ी आंखें जैसे शराब के मस्त कटोरे हों| उसका मेरी तरफ़

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देख कर पलक झपकाना मेरे दिल में कई तीर चला देता था| वो सामनें आंगन में जब बैठ कर कपड़े धोती थी तो उसके सुन्दर वक्ष ऐसे झूलते थे …. मेरा मन उसे मसलनें के लिये उतावला हो उठता था| पेटिकोट में उसके लचकते चूतड़ बरबस ही मेरा लण्ड खड़ा कर देते थे| पर वो मुझे बस मुस्करा कर ही देखती थी…. अकेले में कभी भी घर नहीं आती थी|
जुली सुबह ही स्कूल चली जाती थी…. मैं दस बजे खाना खाकर ही दफ़्तर जाता था|
एक बार मोनिका नें जुली को सवेरे स्कूल जाते समय रोककर कुछ कहा और दोनों मेरी तरफ़ देख कर बाते करनें लगी| फिर जुली चली गई| उसके जानें के कुछ ही देर बाद मैंनें मोनिका को अपनें घर में देखा| मेरी आंखें उसे देख कर चकाचौंध हो गई| जैसे कोई रूप की देवी आंगन में उतर आई हो…. वो बहुत मेक अप करके आई थी| उसका अंग अंग जैसे रूप की वर्षा कर रहा था| उसके उठे हुये गोरे-गोरे चमकते हुये बाहर झांकते हुये उभरे हुये वक्ष जैसे बिजलियां गिरा रहे थे|

उसका सुन्दर गोल गोरा चिकना चेहरा …. निगाहें डालते ही जैसे फ़िसल पड़ी|
“र्….र्….मोनिका जी ! आप …. ?”
“मुझे अन्दर आनें को नहीं कहेंगे?”
“ओ …. हां …. जी हां …. आईये ना …. स्वागत है इस घर में आपका !!!”
“जी, मुझे तो बस एक कटोरी शक्कर चाहिये …. घर में खत्म हो गई है|” उसके सुन्दर चेहरे पर मुस्कराहट तैर गई| मेरी सांसें जैसे तेज हो गई थी| वो भी कुछ नर्वस सी हो गई थी|
“बला की खूबसूरत हो….!”
“जी !…. आपनें कुछ कहा ….?”
मैं हड़बड़ा गया …. मैं जल्दी से अन्दर गया और अपनी सांसें नियंत्रित करनें लगा| यह पहली बार इस तरह आई है , क्या करूँ ….!!!”
मैंनें कटोरी उठाई और हड़बड़ाहट में शक्कर की जगह नमक भर दिया| मैं बाहर आया….
मुझे देख कर उसे हंसी आ गई…. और जोर से खिलखिला उठी|
“जीजू ! चाय में नमक नहीं…. शक्कर डालते हैं …. यह तो नमक है….!”
“अरे यह क्या ले आया …. मैं फिर से अन्दर गया, वो भी मेरे पीछे पीछे आ गई ….
“वो रही शक्कर ….” उसके नमक को नमक के बर्तन में डाल दिया और शक्कर भर ली|
“धन्यवाद जीजू …. ब्याज समेत वापस कर दूंगी !”
और वो इठला कर चल दी….
“बाप रे …. क्या चीज़ है ….!”
उसनें पीछे मुड़ कर कहा,”क्या कहा जीजू…. मैंनें सुना नहीं….!”
“हां…. मैं कह रहा था आप तो आती ही नहीं हो …. आया करो …. अच्छा लगता है!”
“तो लो…. हम बैठ गये ….!”
मैं बगलें झांकनें लगा …. पर उसनें बात बना ली और बातें करनें लगी| बातों बातों में मैंनें उसका मोबाईल नम्बर ले लिया| जब मैंनें बात आगे नहीं बढाई तो वो मुस्करा कर उठी और घर चली गई| मुझे लगा कि मैंनें गलती कर दी…. वो तो कुछ करनें के लिये ही तो शायद आई थी !
और फिर वो मेरे कहनें पर बैठ भी तो गई थी ….
“बहुत लाईन मार रहे थे जी….?”
“नहीं जुली, वो तो नमक लेनें आई थी….”
“नमक नहीं….शक्कर …. मीठी थी ना?”
“क्या जुली …. वो अच्छी तो है…. पर यूँ ना कहो|”
“मन में लड्डू फ़ूट रहे हैं …. मिलवाऊं उससे क्या ?”
“सच …. मजा आ जायेगा ….!”
जुली हंस पड़ी….
“ऐ मोनिका…. साहब बुला रहे हैं …. जरा जल्दी आ….!” जुली नें बाहर झांक कर मोनिका को आवाज दी|
मोनिका नें खिड़की से झांक कर कहा,” आती हूँ !”
वो जैसे थी वैसे ही भाग कर हमारे घर आ गई|
“अरे क्या हुआ साहब को ….?”
“कुछ नहीं, तेरे जीजू तुझे चाय पिलाना चाह रहे हैं|” और हंस दी|
मोनिका भी शरमा गई और तिरछी नजरों से उसनें मुझे देखा| फिर उसकी आंखें झुक गई| जुली चाय बनानें चली गई|
मैंनें शिकायती लहजे में कहा,”सब बता दिया ना जुली को….!”
“तो क्या हुआ …. आप नें तो मुझे फोन ही नहीं किया?”
“करूंगा जरूर ….बात जरूर करना !”
कुछ ही देर में चाय पी कर मोनिका चली गई|
“बहुत अच्छी लगती है ना….?”
मैंनें जुली को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा और सर हां में हिला दिया|
“तो पटा लो उसे …. पर ध्यान रखना तुम सिर्फ़ मेरे हो !”
कुछ ही दिनों में मेरी और मोनिका की दोस्ती हो चुकी थी| वो और मैं जुली की अनुपस्थिति में खूब मोबाइल पर बातें करते थे| धीरे धीरे हम दोनों का प्यार परवान चढ़नें लगा| रात को तो उसका फोन मुझे रोज आता था| जुली भी सुन कर बहुत मजा लेती थी| पर जुली को नहीं पता था कि हम दोनों प्यार में खो चुके हैं| वो कभी कभी मुझे अपनें समय के हिसाब से झील के किनारे बुला लेती थी| वहां पर मौका पा कर हम दोनों एक दूसरे को चुम्मा-चाटी कर लेते थे| कई बार तो मौका मिलनें पर मोनिका के उभार यानि चूतड़ों को और मम्मों को धीरे से दबा भी देता था| मेरी इस हरकत पर उसकी आंखों में लाल डोरे खिंच जाते थे| प्रति-उत्तर में वो मेरे कड़कते लण्ड पर हाथ मार कर सहला देती थी …. और एक मर्द मार मुस्कान से मुझे घायल कर देती थी|
अगले दिन मोनिका के पति के ऑफ़िस जाते ही जुली नें मोनिका को बुला लिया| मुझे लग रहा था कि मोनिका आज रंग में थी| उसकी अंखियों के गुलाबी डोरे मुझे साफ़ नजर आ रहे थे| मैंनें प्रश्नवाचक निगाहों से जुली को देखा| जुली नें तुरन्त आंख मार कर मुझे इशारा कर दिया| मोनिका भी ये सब देख कर लजा गई| मेरा लण्ड फ़ूलनें लगा…. | जुली मोनिका को एक दुल्हन की तरह बेडरूम में ले आई| मोनिका अपना सर झुका कर लजाती हुई अन्दर आ गई|
जुली नें मोनिका को बिस्तर पर लेटा दिया और कहा,”मोनिका, अब अपनी आंखे बन्द कर ले”
“हाय जुली, तू अब जा ना …. अब मैं सब कर लूंगी !”
“ऊं हु …. पहले उसका मुन्ना तो घुसा ले …. देख कैसा कड़क हो रहा है !”
“ऐसे तो मैं मर जाऊंगी …. राम !”
मैं इशारा पाते ही मोनिका के नजदीक आ गया| उसके नाजुक मम्मे को सहला दिया| ये देख कर जुली के उरोज भी कड़क उठे| उसनें धीरे से अपनें मम्मों पर हाथ रखा और दबा दिया| मैंनें मोनिका की जांघों पर कपड़ों को हटा कर सहलाते हुये चूत को सहला दिया| उधर जुली के बदन में सिरहन होनें लगी …. उसनें अपनी चूत को कस कर दबा ली| मोनिका का शरीर वासना से थरथरा रहा था| वो मेरी कमीज पकड़ कर अपनी तरफ़ मुझे खींचनें लगी| उसनें अपनें कपड़े ऊंचे करके अपनें पांव ऊपर उठा दिये| एक दम चिकनी चूत …. गुलाबी सी…. और डबलरोटी सी फ़ूली हुई| मैं तो उसकी चूत देखता ही रह गया, ऐसी सुन्दर और चिकनी चूत की तो मैंनें कभी कल्पना ही नहीं की थी|
“कौशिक, चोद डाल मेरी प्यारी सहेली को ….! है ना मलाईदार कुड़ी !”
मोनिका घबरा गई और मुझे धकेलनें लगी| मैंनें उसे और जकड़ लिया|
“जुली तू जा ना !…. मैं तो शरम से मर जाऊंगी …. प्लीज !” मोनिका नें अनुनय करते हुये कहा|
“वाह री…. मेरी शेरनी …. नीचे दबी हुई है, चुदनें की पूरी तैयारी है …. फिर मुझसे काहे की शरम है…. मुझे भी तो यही चोदता है…. अब छोड़ शरम !”
मेरा लण्ड कड़क था…. उसकी चूत के द्वार पर उसके गीलेपन से तर हो चुका था|
“अरे राम रे …. नहीं कर ना …. उह्ह्ह्ह्…. जुली जा ना …. आईईईईइ…. घुस गया राम जी”
“मोनिका…. इतनी प्यारी चूत मिली है भला कौन छोड़ देगा…. पाव रोटी सी चूत …. रसभरी….” मैंनें वासना से भीगे हुये स्वर में कहा|
“अह्ह्ह्ह मैं तो मर गई …. जुली के सामनें मत चोदो ना …. मां री …. धीरे से घुसाओ ना !”
मैंनें जोर लगा कर लण्ड पूरा ही घुसेड़ दिया| उसनें आनन्द के मारे अपनी आंखें बन्द कर ली| जुली नें भी अपनें कपड़े उतार दिये और मोनिका के करीब आ गई|
“तुम चोदो ना, मैं जरा इस से अपनी चूत चुसवा लूँ….”
जुली नें अपनी टांगें चौड़ी की और दोनों पांव इधर उधर करके मेरे सामनें ही उसके मुख पर अपनी चूत सेट कर ली| अपनें हाथों से अपनी चूत खोल कर उसे मोनिका के मुख पर दबा दिया| मोनिका के एक ही बार चूसनें से जुली चिहुंक उठी| मैंनें भी सामनें मोनिका पर सवार जुली के दोनों बोबे पकड़ कर दबा दिये और उन्हें मसलनें लगा|
“यह मोनिका भी ना साली ! इतनें कपड़े पहन कर चुदा रही है…. ले और चूस दे मेरी चूत !” जुली कुछ असहज सी बोली|
“तू बहुत खराब है …. जीजू को सामनें ही देखते हुये मुझे चुदवा रही है !” मोनिका नें जुली से नजरें चुराते हुये शिकायत की|
“चल हट …. इच्छा तो तेरी थी ना चुदनें की …. अब जी भर कर चुदा ले…. अरे ठीक से मसलो ना कौशिक !”
मैं तो हांफ़ रहा था …. शॉट बड़ी मुश्किल से लग रहे थे| कभी जुली तो कभी मोनिका के भारी भरकम कपड़े….|
अचानक जुली ऊपर से उतर गई और मुझे भी उतार दिया और मोनिका के कपड़े उतारनें लगी|
“ना करो, मनें सरम आवे है ….” वो अपनी गांव की भाषा पर आ गई थी|
“ऐसे तो ना मुझे मजा रहा है और ना कौशिक को….!” कुछ ही देर में हम दोनों नें मोनिका को नंगी कर दिया| वो शरम के मारे सिमट गई| उसकी प्यारी सी गोल गाण्ड उभर कर सामनें आ गई|
“कौशिक चल मार दे इसकी….साली बहुत इतरा रही है, इतनें नखरे मत साली…. मेरे पास भी ऐसी ही प्यारी सी चूत है…. पर मेरा कौशिक तो तुझ पर मर मिटा है ना !”
मुझे तो उसकी सेक्सी गाण्ड देखकर नशा सा आ गया| मैं उसकी पीठ से जा चिपका और उसके चूतड़ों के बीच अपना लण्ड घुसेड़नें लगा| जुली नें मेरी मदद की और उसकी गाण्ड में ढेर सारी क्रीम लगा दी|
“काई करे है…. म्हारी गाण्ड मारेगो …. बाई रे…. अरे मारी नाक्यो रे …. यो तो गयो माईनें !” जोश में मोनिका अपनी मूल भाषा पर आ गई थी|
“मोनिकाजी, आप राजस्थान की भाषा बोलती है…. वहां भी रही है क्या ?” मैंनें आश्चर्य से कहा|
“एक तो म्हारी गाण्ड मारे, फिर पता और पूछे…. चाल रे, धक्का मारो नी सा ….”
मुझे क्या फ़रक पड़ता था भला ! मैंनें अपनी रफ़्तार बढ़ा दी| मोनिका की चिकनी गाण्ड चुदनें लगी| उसकी सिसकारियाँ भी तेज होनें लगी| मुझे वो सब मजा मिल रहा था जिसकी मैं मोनिका के साथ कल्पना करता रहा था| जुली भी मोनिका के नाजुक अंगों से खेल रही थी| मैंनें जुली का हाथ मोनिका के स्तनों से हटा दिया और उसे मैंनें थाम लिया| जुली नें अपनी अंगुली में थूक लगाया और मेरी गाण्ड में धीरे से दबा कर अन्दर कर दी| मुझे इस क्रिया से और आनन्द आनें लगा| मेरा लण्ड फ़ूलता जा रहा था| मोनिका की टाईट गाण्ड चोदनें में मुझे अपूर्व आनन्द आ रहा था| उसकी टाइट गाण्ड नें मेरी जान निकाल दी और मेरा वीर्य निकल पड़ा| मेरा ढेर सारा वीर्य उसकी गाण्ड में भरता चला गया|
मोनिका की गाण्ड मार कर मैं बिस्तर से उतर गया| मोनिका नें जुली की तरफ़ वासना युक्त नजरों से देखा| जुली को तो बस इसी बात का इन्तज़ार था| वो मर्दो की भांति मोनिका पर चढ़ गई और अपनी चूत को उसकी चूत से टकरा दिया| मोनिका नें आनन्द के मारे आंखें बन्द ली| जुली नें अपनी चूत की रगड़ मारी और दोनों का गीलापन चूत पर फ़ैल गया| दोनों नें एक दूसरे के स्तन भींच लिये और मसलनें लगी| अपनी चूत को भी एक दूसरे की चूत से रगड़नें लगी|
“हाय रे जुली, मुझे तो कड़क लण्ड चाहिये …. चूत में घुसेड़ दे…. हाय कौशिक …. मुझे लण्ड खिला दे….”
“अभी उसका ठण्डा है, खड़ा तो होनें दे …. तब तक मेरी चूत का मजा ले…. देख मैंनें भी यह खेल बहुत दिनों के बाद खेला है …. लण्ड तो अपन रोज ही लेते हैं !”
“पर कौशिक का लण्ड तो मैं अपनी चूत में पहली बार लूंगी ना….” मोनिका कसमसाते हुये बोली|
“अरे, अभी तो पेला था उसनें….”
वो तो गाण्ड मारी थी …. चूत तो बाकी है ना …. कौशिक…. प्लीज आ जाना….”
उसकी बातें सुन कर मेरा लण्ड फिर से तन्ना उठा| मैंनें जुली को अपना लौड़ा दिखाया तो वो अलग हो गई| मैंनें मोनिका की टांगें ऊपर करके उसे चौड़ा दी और अपना लण्ड हाथ से थाम कर उसे धीरे से अन्दर तक पिरो दिया| और एक दो बार हिला कर अन्दर तक पूरा घुसेड़ कर जड़ तक सेट कर दिया| फिर उसके ऊपर आराम से लेट गया| उसके बोबे मैंनें थामे और उसे भींच कर, अपनें होंठ उसके होठों से सेट कर दिए| उसके दोनों हाथ मेरे चूतड़ों पर कस गये थे| लण्ड को चूत की गहराइयों में पाकर वो आनन्दित हो रही थी| लण्ड उसकी बच्चेदानी के छेद के समीप पहुंच गया था| उसनें मुझे कस कर पकड़ा हुआ था| चुदाई की रफ़्तार मैंनें आनन्द के मारे तेज कर दी थी| मैं उसकी चूत में लण्ड को ऊपर नीचे रगड़ कर चोदनें लगा था | उसके होंठ जैसे फ़ड़फ़ड़ा कर रह गये…. मेरे अधरों से चिपके उसके होंठ जैसे कुछ कहना चाहते थे| उसका जिस्म वासना से तड़प उठा| उसकी चूत भी ऊपर उठ कर लण्ड लेनें लगी| दोनों जैसे अनन्त सागर में गोते लगानें लगे| चुदाई चलती रही| वो शायद बीच में एक बार झड़ भी गई थी, पर और चुदनें की आशा में वो चुपचाप ही रही| उसकी फ़ूली हुई चूत मेरे लण्ड को गपागप खा रही थी|
हम दोनों एक दूसरे को बस रगड़ कर चोद रहे थे, समय का किसे ज्ञान था, जानें कब तक हम चुदाई करते रहे| दूसरी बार जब मोनिका झड़ी तो इस बार वो चीख सी उठी| मेरी चुदाई की तन्मयता भंग हो गई, और मेरा लन्ड भी फ़ुफ़कारता हुआ, किनारे पर लग गया| वीर्य लावा की तरह फ़ूट पड़ा …. और उसकी चूत में भरता गया|
“हाय बस करो …. आगे पीछे सब जगह तो अपना माल भर दिया …. बस करो….”
जुली पास में बैठी अपनी चूत को अंगुली से चोद रही थी, अपनें दानें को हिला हिला कर अपना माल निकालनें की कोशिश कर रही थी| हम दोनों नें उसकी सहायता की और मैंनें उसकी चूत में अपनी अंगुली का कमाल दिखाना आरम्भ कर दिया| उधर मोनिका नें उसके मम्मे मसल कर और उसके अधरों को चूस कर उसे मस्त करनें लगी| जुली की चूत के दानें को मसलते ही वो तड़प उठी और झड़नें लगी|
“हाय कौशिक…. मैं तो गई…. आह निकल गया …. साले मर्दों के हाथ की बात तो मस्त ही होती है…. कैसा हाथ मार कर मेरी जान निकाल दी !”
हम तीनों सुस्तानें लगे| जुली उठी और कुछ ही देर में दूध गरम करके ले आई|
“लो कमजोरी दूर करो और दूध पी जाओ !”
हम सभी धीरे धीरे दूध पीनें लगे …. तभी मोनिका को जैसे खटका हुआ| उसनें फ़टाफ़ट अपनें कपड़े पहनें और अपनें आप को ठीक किया और तेजी से भाग निकली|
“अरे ये मोनिका का आदमी आज जल्दी कैसे आ गया?” हम दोनों ही आश्चर्य कर रहे थे| थोड़ी ही देर में उनके झग़ड़े की आवाजे आनें लगी|
“क्या कर रही थी अब तक…. खाना क्यो नहीं पकाया …. मेरा बाप बनायेगा क्या ? बहुत तेज भूख लगी है|”
हम दोनों नें एक दूसरे को देखा और हंस पड़े|
“उसकी मां चुदनें दे यार …. आज छुट्टी ली है तो उसका पूरा फ़ायदा उठायें !” मैंनें मुस्करा कर कहा और जुली मेरे से चिपक गई।

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