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क्या करे दिल है कि मानता नही

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क्या करे बेचारा दिल जब कोई हसीना अपनें हुस्न के ऐसे जलवे दिखाए कि आदमी बेचारा अपना लंगोट ढीला करनें को मजबूर हो जाए !

आज के समाज में अक्सर मर्द को दोषी घोषित कर दिया जाता है पर मेरा यह मानना है कि जब तक औरत इशारा ना दे तब तक कोई भी मर्द उसको छूनें तक की हिम्मत नहीं कर सकता है।

मेरी यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा घटित हुआ कि मैं अपनें आप को रोक नहीं सका। यह कहानी मेरे और मेरी एक रिश्तेदार के बीच के सम्बन्ध पर है।

रेशमा नाम था उसका, कुँवारी कन्या थी। मुझे भाई कह कर बुलाती थी पर मैं उससे थोड़ा दूरी ही बना कर रखता था क्योंकि उसके परिवार के साथ हमारा ज्यादा मेलजोल नहीं था। कुछ पारिवारिक मतभेद थे। पर रेशमा को जैसे इन मतभेद का अंदाजा नहीं था तभी तो वो जब भी मिलती दिल से मिलती थी।

रेशमा इक्कीस साल की हो चुकी थी। बी. ए. फाइनल में पढ़ती थी। मेरे ऑफिस का रास्ता रेशमा के कॉलेज के पास से होकर गुजरता था तो अक्सर वो मुझे कॉलेज के बाहर या फिर कॉलेज के रास्ते में मिल जाती थी। कभी कभी जब रास्ते में मिलती तो लिफ्ट मांग लेती। मैं चाहते हुए भी मना नहीं कर पाता था। जब भी मेरी बाइक पर मेरे पीछे बैठती तो मुझसे चिपक जाती।

मैं चाहे चूत का कितना भी रसिया था पर रेशमा के लिए मेरे मन में कभी भी सेक्स वाली भावना नहीं आई थी। शायद वो इसीलिए अभी तक मेरे हथियार से बची हुई थी।

खूबसूरती की बात की जाए तो रेशमा बहुत ज्यादा खूबसूरत तो नहीं थी पर नई नई जवानी फ़ूट रही थी तो अनायास ही लड़कों की नजरों में आ जाती थी। चूचियाँ बहुत बड़ी नहीं थी पर कूल्हे बहुत गजब के थे। जींस पहन कर जब कूल्हे मटका कर चलती थी तो कसम से अच्छे अच्छे लड़कों की हालत खराब कर देती थी।

यह कहानी तब शुरू हुई जब एक दिन मैं ऑफिस से वापिस आ रहा था और मैं रेशमा के कॉलेज के पास पहुँचा ही था कि बारिश शुरू हो गई। मैं बाइक रोक कर कॉलेज के गेट के पास बनें शेड के नीचे खड़ा हो गया। कॉलेज की छुट्टी हो चुकी थी सो चौकीदार नें भी मुझे कुछ नहीं कहा वैसे तो वो लड़कों को गेट के आसपास भी फटकनें नहीं देता था।

मैं गेट पर खड़ा बारिश के कम होनें का इन्तजार कर ही रहा था कि मुझे कॉलेज के अंदर तीन-चार लड़कियाँ नजर आई और उनमें से एक रेशमा भी थी। मैं नहीं चाहता था कि वो मुझे देख ले पर फिर भी उसनें मुझे देख ही लिया।

वो बारिश में ही दौड़ कर मेरे पास आई और बोली– वाह भाई… लड़कियों के कॉलेज के आगे खड़े किस का इन्तजार कर रहे हो?

मैं क्या जवाब देता !

“चलो आ ही गए हो तो मुझे भी घर छोड़ दो…”

“रेशमा अभी बारिश हो रही है… बारिश रुकेगी तो मैं जाऊँगा।”

“अरे भाई… चलो ना ! बारिश तो हल्की हो गई है और फिर बारिश की फुहारों में मज़ा आ जाएगा !”

मुझे भी देर हो रही थी तो सोचा चल ही पड़ते हैं। बाइक उठाई तो रेशमा झट से मेरे पीछे बैठ कर मुझसे चिपक गई। बाइक चली तो बारिश की ठंडी ठंडी फुहारें मुँह पर पड़नें लगी। बारिश की फुहारों और एक जवान लड़की के स्पर्श नें मेरे अंदर वासना की ज्वाला को जगा दिया था। वो पहला दिन था जब मुझे जवान रेशमा के बदन की गर्मी महसूस हुई। उसके छोटे छोटे चूचे मेरी कमर पर गड़ रहे थे। मन में रेशमा की जवानी का ख्याल आया तो पैंट में उभार आनें लगा।

सड़क पर जगह जगह पानी भर गया था और पता नहीं चल रहा था कि कहाँ सड़क है और कहाँ गड्ढा। अचानक एक जगह बाइक गड्ढे में गई तो मुझे एकदम से ब्रेक लगानी पड़ी। अचानक ब्रेक लगनें से रेशमा जो पहले से ही मुझसे चिपकी हुई थी, वो एकदम से मेरे ऊपर आ गिरी और उसका हाथ जो मेरे पेट पर था फिसल कर मेरी पैंट में बनें तम्बू पर चला गया।

वो अपनें आप को संभाल नहीं पाई और संभलनें के चक्कर में उसकी मुट्ठी में मेरा लंड आ गया। मेरे सारे बदन में जैसे कर्रेंट सा दौड गया। रेशमा के बदन में भी सिहरन मैंनें महसूस की।

बाइक जब दुबारा चली तो रेशमा थोड़ा हट कर बैठ गई। अब उसनें मेरे पेट की जगह मेरे कंधे को पकड़ लिया था। चलते चलते हम खुली सड़क पर पहुँचे ही थे कि जोरदार बारिश शुरू हो गई। सड़क पर कहीं भी रुकनें की जगह नहीं थी। करीब आधा किलोमीटर चलनें के बाद एक शेड नजर आया तो मैंनें बाइक वहाँ रोक दी। रेशमा उतर के शेड के नीचे चली गई। बाइक स्टैंड पर लगा कर मैं भी शेड के नीचे गया तो पहली बार मैंनें रेशमा को ध्यान से देखा। बारिश में बुरी तरह से भीगनें के कारण रेशमा थोड़ा थोड़ा कांप रही थी और उसके कपड़े भी बदन से चिपक गए थे।

“क्यों रिशु… आया मज़ा बारिश में भीगनें का..?” मैंनें उसको छेड़ते हुए कहा तो वो कुछ नहीं बोली बस हल्के से मुस्कुरा दी।

बारिश और तेज होती जा रही थी। सड़क पर भी ट्रेफिक बहुत कम था। एक्का-दुक्का कार या बाइक ही नजर आ रही थी। शेड के नीचे भी बस हम दोनों ही थे।

“भाई… चलो मुझे देर हो रही है और वैसे भी भीग तो गए ही हैं।”

मैंनें उसकी बात मान ली और हम दोनों फिर से बाइक पर चल दिए। तेज बारिश में बाइक चलानें में दिक्कत हो रही थी पर फिर भी मैं धीरे धीरे चलते हुए रेशमा के घर पहुँच गया। रेशमा को उतार कर जब मैं अपनें घर की तरफ चलनें लगा तो रेशमा नें मेरी बाँह पकड़ कर मुझे अंदर चलनें को कहा।

“प्लीज भाई… अंदर चलो ना मेरे साथ… मुझे आज बहुत देर हो गई है तो सब गुस्सा करेंगे… तुम साथ रहोगे तो कोई कुछ नहीं बोलेगा।”

मैं उसके निवेदन को ठुकरा नहीं सका। हम दोनों अंदर गए तो रेशमा की मम्मी नें दरवाजा खोला। मुझे देख कर उन्होंनें बैठनें को कहा और फिर अंदर चली गई। रेशमा के पापा अभी तक घर नहीं आये थे। रेशमा अपनें कमरे में चली गई थी।

मेरे कपड़े गीले थे तो मैं बैठनें के लिए जगह देखनें लगा पर मुझे ऐसी कोई जगह नहीं दिखी जहाँ मैं गीले कपड़ों के साथ बैठ सकता सो मैं खड़ा रहा।

पाँच मिनट के बाद रेशमा कपड़े बदल कर आई। उसनें गुलाबी टॉप और ब्लैक स्कर्ट पहनी हुई थी। टॉप कुछ टाईट था और रेशमा नें नीचे ब्रा भी नहीं पहनी हुई थी। इसीलिए चूचियों के चुचूक साफ़ नजर आ रहे थे। चुचक देखते ही मेरे लंड नें सर उठाना शुरू कर दिया।

“अरे भाई.. तुम अभी तक खड़े ही हो… बैठो ना…”

“रिशू मेरे कपड़े गीले है… सोफा खराब हो जाएगा… मैं चलता हूँ फिर कभी आऊँगा… आज तो वैसे भी बहुत देर हो गई है।”

“चलो मेरे कमरे में… पानी पोंछ लो… फिर गर्म गर्म चाय पीते हैं… फिर चले जाना।” इतना कह कर रेशमा मुझे लगभग खींचती हुई अपनें कमरे में ले गई।

कमरे में जाते ही रेशमा नें मुझे तौलिया दिया। मैं अपनें सिर और चेहरे पर से पानी साफ़ करनें लगा तो रेशमा बोली- भाई, एक बार अपनें सारे कपड़े उतार कर अच्छे से पानी पोंछ लो… मैं तब तक चाय लेकर आती हूँ।

इतना कह कर रेशमा कमरे से बाहर चली गई। मुझे थोड़ा अजीब लग रहा था पर फिर रेशमा के जानें के बाद मैं बाथरूम में घुस गया और अपनी शर्ट और पैंट उतार कर बदन साफ़ करनें लगा। अंडरवियर तक गीला हो चुका था तो मैंनें अपनी बनियान और अंडरवियर भी उतार दिया और कपड़े निचोड़नें लगा।

मैं बिल्कुल नंगा बाथरूम में खड़ा अपना बदन पोंछ रहा था कि अचानक दरवाजा खुला और साथ ही मेरे कानों में रेशमा की आवाज सुनाई पड़ी।

“ओह..माय..गोड.. !” रेशमा अपनें मुँह पर हाथ रखे मेरी तरफ देख रही थी।

तभी मुझे भी ध्यान आया कि मैं नंगा हूँ। मैंनें नीचे देखा तो मेरा लंड अपनें पूरे शवाब पर तन कर खड़ा था। रेशमा भी अवाक निगाहों से मेरे लंड की तरफ ही देख रही थी। मैंनें झट से तौलिया अपनें नंगे बदन पर लपेटा और बाहर जानें लगा पर जैसे ही मैं रेशमा के पास से गुजरनें लगा तो एकदम से तौलिया फिर से खुल गया। तौलिया खुलता देख रेशमा की हँसी छूट गई और वो हँसती हुई कमरे से बाहर निकल गई।

मैं भी थोड़ा शर्मिंदा सा महसूस कर रहा था सो मैंनें जल्दी से अपनें कपड़े पहनें और फिर बारिश में ही अपनें घर की तरफ चल दिया। आज एक बात तो हुई थी कि रेशमा की जवानी मेरी नजर में चढ़ गई थी। उस रात को मैंनें सपनें में रेशमा को चोद दिया था।

अगले दो तीन दिन मेरा और रेशमा का सामना नहीं हुआ। फिर चौथे दिन रेशमा का फोन आया।

“भाई… कहाँ हो?”

“अभी तो ऑफिस में ही हूँ… बोलो कुछ काम था क्या?”

“काम था भी और नहीं भी…”

“मतलब?”

“मतलब यह कि मम्मी घर पर नहीं है और मैं अकेली बोर हो रही हूँ।”

“तो…?”

“तो क्या… आ जाओ मूवी देखेंगे…”

“रिशु… बहुत काम है… आना मुश्किल होगा।” मैंनें रेशमा को टालते हुए कहा जबकि उसके अकेले होनें की बात सुन कर ही लंड महाराज सर उठानें लगे थे।

“प्लीज भाई आ जाओ ना… बहुत बोर हो रही हूँ…”

“ओ के… मैं कोशिश करता हूँ…”

मेरी हाँ होते ही रेशमा खुश हो गई। वैसे मैं भी तो उस दिन से ही रेशमा से अकेले में मिलनें के मौका की तलाश में था। मैं बॉस को जरूरी काम का बोल कर ऑफिस से निकल लिया और पन्द्रह मिनट के बाद मैं रेशमा के घर के दरवाजे पर था।

जैसे ही मैंनें दरवाजा खटखटाया तो दरवाजा ऐसे खुला जैसे रेशमा दरवाजे पर खड़ी मेरा ही इन्तजार कर रही थी।

दरवाजे के अंदर जाते ही रेशमा मेरे गले से लग गई और मुझे आनें के लिए धन्यवाद किया।

“आंटी कहाँ गई हुई हैं…?”

“वो तो महोल्ले की औरतों के साथ आज वृन्दावन गई है देर रात तक ही आएँगी।”

“तो अब तुम्हारा क्या इरादा है…?”

“इरादा तो मूवी देखनें का है अगर तुम हाँ करो तो…”

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“ओह.. सिर्फ मूवी..”

“क्यों भाई इरादा तो नेंक है तुम्हारा…?”

रेशमा नें जिस ढंग से मुझ से पूछा तो मैं सकपका गया। मन में तो आ रहा था कि कह दूँ कि तुम्हें चोदनें का इरादा है, पर मैं चुप रहा।

मेरी हालत देख कर रेशमा हँस पड़ी।

मैं जाकर सोफे पर बैठ गया। रेशमा रसोई में गई और दो गिलास में कोल्डड्रिंक डाल कर ले आई। पहले तो वो दूसरे सोफे पर बैठनें लगी फिर पता नहीं क्या सोच कर मेरे ही सोफे पर आकर बैठ गई।

“रिशु… इस ड्रेस में तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो..!” मैंनें रेशमा की तारीफ करते हुए अपना हाथ रेशमा की जांघ के पास जानबूझ कर रखा तो रेशमा नें अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया।

“भाई, सभी लड़कियों को ऐसे ही पटाते हो क्या…?”

“हा हा हा… अब तुम्हें भी पटानें की जरुरत पड़ेगी क्या?” मैंनें उसकी जांघ पर अपनें हाथ का दबाव थोड़ा और बढ़ाते हुए पूछा।

वो कुछ नहीं बोली बस उसकी आँखें बंद हो गई और मुँह से आह निकल गई।

मेरे लिए तो इतना इशारा ही काफी था। मैंनें अपना हाथ रेशमा की जांघ से उठा कर उसके पेट के नंगे हिस्से पर रख दिया और धीरे धीरे सहलानें लगा।

रेशमा के मुँह से सिसकारी निकल गई और उसका बदन कांपनें लगा था। लड़की पूरी तरह से गर्म हो चुकी थी। मैंनें कोल्डड्रिंक का गिलास साइड में रखा और रेशमा को पेट से पकड़ कर अपनें पास खींचा तो शरमाते हुए उठ कर रसोई में भाग गई।

अब कोई गुंजाइश बाकी नहीं बची थी कि रेशमा भी चुदना चाहती थी।

मैं उठ कर रसोई में गया तो रेशमा वहाँ दिवार से लग कर खड़ी थी और लंबी लंबी साँसें ले रही थी। मैंनें रेशमा के पास जाकर रेशमा के कंधे पर हाथ रखा तो वो शरमाते हुए मुझसे लिपट गई।

मैंनें रेशमा का चेहरा ऊपर उठाया तो रेशमा की आँखें बंद थी और होंठ कांप रहे थे। मैंनें झट से अपनें होंठ रेशमा के कांपते होंठों पर रख दिए।

रेशमा नें एक बार तो छूटनें की कोशिश की पर मेरी पकड़ ढीली नहीं थी सो वो फिर से मुझ से चिपक गई और चुम्बन का आनन्द लेनें लगी।

चुम्बन लेते लेते मेरे हाथ रेशमा की चूचियों को सहलानें लगे। रेशमा अब मस्ती के मारे बदहवास सी होती जा रही थी। असली काम का समय नजदीक आ चुका था। अब देर करना ठीक नहीं था। मैंनें रेशमा को अपनी बाहों में उठाया और वापिस उसको ले जाकर सोफे पर लेटा दिया।

वो रेशमा जो मुझे कम ही पसंद थी आज बहुत हसीन लग रही थी।

रेशमा को सोफे पर लेटानें के बाद मैंनें मेरे होंठ रेशमा की टांगों के नंगे हिस्से पर रख दिए और चूमते चूमते रेशमा की स्कर्ट को ऊपर करनें लगा।

रेशमा शर्म के मारे मुझे स्कर्ट ऊपर उठानें से रोक रही थी पर मेरे चुम्बन रेशमा की आग को ज्वालामुखी बनानें में लगे थे। रेशमा की सिसकारियाँ ड्राइंगरूम में गूंजनें लगी थी। मैं जीभ से चाटते हुए उसकी चूत तक पहुँच रहा था। गुलाबी रंग की पैंटी में रेशमा की चूत से निकले पानी का एक बड़ा सा दाग पड़ चुका था।

मैंनें रेशमा की दोनों टाँगें खोली और उसकी टांगों के बीच में आकर उसकी जांघों को चाटनें लगा। रेशमा मस्ती के मारे सर इधर उधर पटक रही थी। मैंनें हाथ स्कर्ट के अंदर डाल कर रेशमा की पैंटी उतार दी।

बिना बालों वाली सील बंद कुँवारी चूत मेरी नजर के सामनें थी। एक बार तो मैं चूत को देखता ही रह गया। बहुत दिनों के बाद कोई सीलबंद कुँवारी चूत मेरे लंड को नसीब होनें वाली थी। वो तो पहले से ही अकड़ कर फटनें को हो रहा था।

मैंनें अपनें होंठ रेशमा की रस से भरी कुँवारी चूत पर रखे तो रेशमा मस्ती के मारे पानी पानी हो गई।

“भाई… मैं मर जाऊँगी… आह्ह्ह…ये क्या कर दिया भाई तुमनें… ओह्ह्ह भाईईईई…. मुझ से सहन नहीं हो रहा है… कुछ करो जल्दी से… ओह्ह्ह… आह्ह्ह !!!”

सहन तो अब मुझ से भी नहीं हो रहा था, मैंनें खड़े होकर झट से अपनें कपड़े अपनें बदन से अलग किये और नंगा होकर रेशमा के सामनें था। मैं अब सोफे पर बैठ गया और रेशमा को खड़ा करके उसके भी दोनों कपड़े मतलब टॉप और स्कर्ट उतार कर एक तरफ रख दिए। रेशमा का नंगा बदन देखा तो देखता ही रह गया। वो अजंता की किसी मूर्त से कम नहीं लग रही थी। छोटी छोटी चूचियाँ भी उसके पतले से बदन पर क़यामत लग रही थी।

रेशमा को जब एहसास हुआ कि वो बिल्कुल नंगी मेरे सामनें खड़ी है तो वो अपनी आँखों पर हाथ रख कर शर्म के मारे दूसरी तरफ मुँह करके खड़ी हो गई। मैंनें उसको पीछे से अपनी बाहों में जकड़ा और उसकी गर्दन पर अपनें होंठ रख दिए।

रेशमा सीत्कार उठी थी।

मैंनें हाथ आगे ले जा कर रेशमा की चूचियों को मसलना शुरू कर दिया। मेरा मोटा और लंबा लंड रेशमा की गांड में गड़ रहा था। मैं रेशमा के कानों की लटकन को चूम रहा था, उसकी गर्दन को चूम रहा था और रेशमा मदहोश हो रही थी।

मैंनें अपनें हाथ को नीचे रेशमा की चूत पर ले जा कर उसको अपनी उंगली से सहलाया तो रेशमा मस्ती के मारे मुझ से चिपक गई और उसनें भी हाथ नीचे करके मेरे लंड को पकड़ लिया और उसको सहलानें लगी।

कण्ट्रोल करनें की स्थिति में मैं भी नहीं था अब।

मैंनें रेशमा को गोदी में उठाया और सामनें रखी एक मेज पर लेटा दिया। तेल या क्रीम ढूंढनें का समय नहीं था सो थोड़ा सा थूक रेशमा की चूत पर डाला और अपना लंड रेख कर लंड को छोटी सी चूत में घुसानें की कोशिश करनें लगा।

चूत बहुत टाईट थी, जैसे ही मैंनें लंड को थोड़ा अंदर की तरफ घुसानें की कोशिश की तो दर्द की लकीरें रेशमा के चेहरे पर नजर आनें लगी।

मैंनें लंड हटा कर थोड़ा सा थूक और लगाया रेशमा की चूत पर और फिर लंड को सेट करके एक जोरदार धक्का लगा दिया। फट की आवाज के साथ लंड का मोटा सुपारा रेशमा की नाजुक चूत को छेदता हुआ अंदर घुस गया और साथ ही रेशमा की घुटी हुई चीख कमरे में गूंज गई।

वो तो मैंनें सही समय पर रेशमा के मुँह पर हाथ रख दिया नहीं तो पूरी कॉलोनी को रेशमा की चूत के फटनें की खबर हो जाती।

“आह्ह्ह्ह्ह भाई… निकाआअल्ल्ल्ल्लो बाहर…. बहुत दर्द हो रहा है भाई… फट गई मेरी तो…ओह्ह उईईइ मर गईईइ…” रेशमा दर्द के मारे तड़प रही थी।

मैं भी कोई कच्चा खिलाड़ी नहीं था, मुझे पता था कि लड़की अगर ऐसे एक बार लंड के नीचे से निकल जाए तो फिर दुबारा लंड के नीचे आसानी से नहीं आती। मैंनें रेशमा को जकड़ रखा था और वो छूटनें को छटपटा रही थी।

मैंनें मौका देखा और एक जोरदार धक्का लगाया और लंड को दो-तीन इंच अंदर घुसा दिया। रेशमा की चूत सच में बहुत टाईट थी। मेरा लंड ऐसा हो रहा था जैसे किसी शिकंजे में जकड़ दिया गया हो।

तभी मुझे रेशमा की चूत से कुछ गर्म गर्म रिसता हुआ महसूस हुआ। जिसका साफ़ मतलब था की किला फतह हो चुका था। मैंनें जोश में आकर लगातार दो-तीन धक्के लगाकर पूरा लंड रेशमा की चूत में घुसा दिया। रेशमा की आँखों से आंसुओं की धारा और चूत से खून की धार बह रही थी।

मैं जानता था कि अब आगे क्या करना है। मैं रेशमा पर झुक कर उसकी चूची को मुँह में लेकर चुम्भलानें लगा। रेशमा दर्द के मारे तड़प रही थी और मुझे दूर धकेलनें की कोशिश कर रही थी।

दो-तीन मिनट बाद रेशमा थोड़ा शांत हुई तो मैंनें लंड को धीरे धीरे अंदर-बाहर करनें लगा। रेशमा हर धक्के पर आह्ह्ह ओह्ह्ह उईईई मर गईई कर रही थी। लंड अब चूत में अपनी जगह बना चुका था और रेशमा की चूत नें भी बहुत सारा पानी छोड़ दिया था जिससे लंड अब आराम से अंदर-बाहर हो रहा था। अब रेशमा की दर्द भरी आहें मस्ती भरी सिसकारियों में बदल गई थी।

“आह्ह धीरे भाई… धीरे उम्म्मम्म… तुम बहुत जालिम हो भाई… ओह्ह्ह उईईइ आह्ह्ह चोदो मुझे और जोर से चोदो…”

मैं भी रेशमा की चिकनी टांगों को अपनें कंधे पर रख कर पूरे जोश के साथ रेशमा की चुदाई कर रहा था। लंड अब सटासट अंदर-बाहर हो रहा था। रेशमा भी गांड उठा उठा कर लंड को अपनी चूत में ले रही थी।

लगभग दस मिनट की चुदाई के बाद रेशमा का बदन अकड़नें लगा और आठ दस धक्कों के बाद ही वो जोरदार ढंग से झड़नें लगी। इतनी गर्म और टाईट चूत चोदते चोदते मैं भी अब झड़नें के कगार पर था।

“ओह्ह्ह जोर जोर से फाड़ दे भाई… आह्ह्ह मैं गई भाई मैं गईई… जोर जोर से चोद भाई… जोर जोर से चोद मेरे राजा… चोद मुझे आह्ह्ह उईईइ आआआह्ह्ह !!”

“ले मेरी रानी… ले चुद मेरे लंड से… मेरा लंड तो निहाल हो गया तेरी चूत में घुस कर… क्या मस्त चूत है मेरी रानी तेरी… ले चुद और चुद… अब तो तुझे हर रोज चोदा करूँगा…”

मैंनें धक्कों की स्पीड बढ़ा दी थी। रेशमा का पानी निकल जानें से अब फच्च फच्च की आवाज कमरे में गूंजनें लगी थी। मेरा बदन भी अकड़नें लगा था।

मैं रेशमा के बदन पर झड़ना चाहता था पर फिर जैसे शैतान हावी हो गया और मैं झर झर करके रेशमा की चूत के अंदर ही झड़नें लगा, मैंनें पूरा माल रेशमा की चूत के अंदर ही झाड़ दिया। रेशमा की चूत मेरे वीर्य से लबालब भर गई।

रेशमा मस्ती के मारे मुझ से बुरी तरह से लिपट गई, उसकी टाँगें अब मेरी कमर के इर्दगिर्द लिपटी हुई थी और बाहों से उसनें मेरे सिर को अपनी चूचियों पर दबा रखा था। मैं भी उसके ऊपर लेटा हुआ हांफ रहा था।

करीब दस मिनट के बाद हम दोनों उठे तो रेशमा को इस बाद का एहसास हुआ कि मैंनें वीर्य उसकी चूत में ही डाल दिया है तो वो परेशान हो गई।

पर मैंनें उसको टेबलेट के बारे में बताया तो वो थोड़ी नोर्मल हुई। उसनें मेरा लंड और अपनी चूत साफ़ की और फिर लड़खड़ाते क़दमों से बाथरूम में घुस गई।

पाँच मिनट के बाद वो वापिस आकर फिर से मेरी गोद में बैठ गई। मैं उसके होंठो को चूसनें लगा और उसकी चूचियों को सहलानें लगा। कुछ देर बाद ही हम दोनों फिर से चुदाई के सागर में गोते लगानें को तैयार थे। शाम को पाँच-छ: बजे तक हमनें तीन बार चुदाई का आनन्द लिया।

उसके बाद उसकी मम्मी का फोन आ गया कि वो एक घंटे तक घर पहुँच जाएंगे। मैं भी उठा और बाथरूम में फ्रेश होकर कपड़े पहन कर तैयार हो गया।

जब मैं रेशमा के घर से निकलनें लगा तो रेशमा मुझसे लिपट गई और मुझे थेंक्यू बोला।

मैं भी उसके होंठो पर एक प्यारा सा किस लेकर अपनें घर की तरफ चल दिया।

अगले कुछ महीनों तक हम दोनों जब भी मौका मिलता चुदाई करते रहे। उसके बाद रेशमा की शादी एक एन.आर.आई. लड़के से हो गई और वो उसके साथ विदेश चली गई। आज भी वो मुझे बहुत याद आती है

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