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आख़िर चोद ही डाला मेरे ससुर जी नेंं मुझे -3

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मैनें लाख सहलाया, फिर से हिला नहीं. मुँह में ले कर चुस ती, लेकिन प्रदीप नें ऐसा करनें ना दिया. रात काफ़ी बीत चुकी थी. में एक्साइट हो गयी थी लेकिन प्रदीप अनारी था. लंड खड़ा होनें पैर भी उस के दिमाग़ में चोद नें की इच्छा पेदा नहीं हुई थी. वो बोला : भाभी, मुज़े नींद आ रही है उस रात से वो मुझे भाभी कहनें लगा. मैनें उसे गोद में ले कर सुलाया तो तुरंत नींद में खो गया. मैनें सोचा आगे आगे चुदाई के पाठ पढ़ा उंगी और एक दिन उस का लंड मेरी चूत में ले कर चुदवा उंगी ज़रूर. लेकिन मेरे नसीब में कुछ ओर लिखा था. उन के कुछ शरारती दोस्तों नें उन के दिल में ठसा दिया की चूत में दाँत होते हैं नूनी जो चूत में डाली तो चूत उसे काट लेगी, फिर वो पीसाब कहाँ से करेगा. मेनें लाख समझाया लेकिन वो नहीं माना. मैनें कहा की उंगलियाँ डाल कर देख लो की अंदर दाँत है या नहीं. वो भी नहीं किया उस नें. बीन चुदवाये में कम्वारी ही रहरसिकलाल की पहचान वाले और प्रदीप के कई मुँह-बोले दोस्तों में से कितनें भी ऐसे थे जिस नें मुझ पर बुरी नज़र डाली. दूर के एक देवर नें खुला पूछ लिया : भाभी, प्रदीप चोद ना सके तो गभराना नहीं, मैं जो हूँ चाहे तब बुला लेना. उन सब को मैनें कह दिया की प्रदीप मेरे पति हें और मुझे अच्छी तरह चोद ते हें. दिन भर मैं उन सब का हिम्मत से सामना करती थी, रात अनारी बालम से बीन चुदवाये फूट फूट कर रो लेती थी. रसिकलाल लेकिन हुशियार थे, उन को तसल्ली हो गयी थी की प्रदीप नें मुझे चोदा नहीं था. मुझे शक है की चुपके से वो हमारे बेडरूम में देखा करते थे.

जो कुछ भी हो, उन्हे पितामह बन नें की उतावल थी.एक दिन एकांत पा कर मुझ से पूछा : क्यूं बेटी ? सब ठीक है ना ? उन का इशारा चुदाई की ओर था जान कर मुझे शर्म आ गयी मेनें सिर ज़ुक लिया, कुछ बोल ना सकी.. में रो पड़ी. मेरे कंधों पर हाथ रख कर वो बोले : मैं सब जनता हूँ तू अब भी कम्वारी हो. प्रदीप नें तुझे चोदा नहीं है सच है ना ? ससुरजी के मुँह से चोदा सुन कर मैं चोन्क़ गयी उन की बाहों से निकल गयी कुछ बोली नहीं. आँसू पॉच कर सिर हिला कर हा कही.वो फिर मेरे नज़दीक आए, मेरे कंधों पर अपनी बाह रख दी और बोले : बेटी, ये राज़ हम हमारे बीच रखेंगे की प्रदीप चोद नें के काबिल नहीं है लेकिन मुज़े पोता चाहिए इस का क्या ? मेरी इतनी बड़ी जायदाद, इतना बड़ा कारोबार सब सफ़ा हो जाएगा मेरे मार नें के बाद. वो तो वो लेकिन जब मैं इस दुनिया में ना रहूं तब तेरी और प्रदीप की देख भाल कौन करेगा जब तुम दोनो बुड्ढे हो जाओगे ? मुज़े लड़का चाहिए. है कोई इलाज तेरे पास ?मैं बोली : मैं क्या कर सकती हूँ पिताजी ? रसिकलाल : तुझे करना कहाँ है ? करवाना है सम्जी ? मैं : हाँ, लेकिन किस के पास जा उन ? आप की इच्छा है की मैं ओर कोई मर्द छी छी मुझ से ये नहीं हो सकेगा. रसिकलाल : मैं कहाँ कहता हूँ की तू ग़ैर मर्द से चुदवाओ. ससुरजी फिर चुदवाओ बोले, मुझे शरम आ गयी सच कहूँ तो मुझे बुरा नहीं लगा, थोड़ी सी गुदगुदी हो गयी और होटों पैर मुसकान आ गयी जो मैनें मुँह पर हाथ रख कर छुपा दी.

मैनें पूछा : आप की क्या राई है ?कुछ मिनीटों वो चुप रहे, सोच में पड़ गये बोले : कुछ ना कुछ रास्ता मिल जाएगा, मैं सोच लूंगा. मुझे तू वचन दे की तू पूरा सहकार देगी. देगी ना ? मैनें वचन दे दिया. वो चले गयेउस दिन के बाद ससुरजी का वर्तन बदल गया. अब वो अच्छे कपड़े पहन नें लगे. रोज़ शेविंग कर के स्प्रे लगा नें लगे. बाल जो थोड़े से सफ़ेद हुए थे वो रंग लगवा कर काले बना दिएक बार उन्हों नें पानी का पियाला माँगा. मेनें पियाला धर दिया तब लेते वक़्त उन्हों नें मेरी उंगलियाँ छू ली. दुसरी बार पियाला पकड़ नें से पहले मेरी कलाई पकड़ ली. बात बात में मुज़े बाहों में ले कर दबोछ लेनें लगे. मुज़े ये सब मीठा लगता था. आख़िर वो एक हट्टे कट्टे मर्द थे, भले प्रदीप जैसे जवान ना थे लेकिन मर्द तो थे ही. सासूज़ी के देहांत का एक साल हो गया था. मेरे ख़याल से उस के बाद उन्हों नें कभी चुदाई नहीं की थी, किसी के साथ मेरे जैसी जवान लड़की घर में हो, एकांत मिलता हो तो उन का लंड खड़ा हो जाय इस में उन का क्या कसूर ?थोड़े दिन तक मेरी समझ में आया नहीं की मैं क्या करूँ. फिर सोचनें लगी की क्यूं ना सहकार दूं ? ज़्यादा से ज़्यादा वो क्या करेंगे ? मुज़े चोदेन्गे ? हाय हाय सोचते ही मुझे गुदगुदी हो गयी ना ना, ऐसा नहीं करना चाहिए. क्यूं नहीं ? बच्चा पेदा होगा तो सब समस्याएँ हल हो जाएगी. किस को पता चलेगा की बच्चा किस का है ?

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