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“देख लेंगे कितना चीख निकलवाते हो जीजा”2

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सम्पादक : मनोज

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बिना सोचे समझे बोल पड़ी:- तो ठीक है लगी शर्त |
जीजा तो जैसे तैयार ही बैठा था, मेरी बांह पकड़ कर बोला:- तो चलो, तुम्हारी चीखें निकलवाते हैं|
जीजा के मुँह से यह सुनते ही जैसे मैं स्वप्न से जागी, मैं तो शर्म के मारे लाल हो गई थी| मेरी तो समझ में ही नहीं आया कि क्या करूँ |
पर फिर भी मैंनें हिम्मत दिखाई और बोली:- जीजा समय आनें दो, देख लेंगे तुम्हें भी कि कितनी चीखें निकलवा सकते हो?और मैं हँस कर वहाँ से भाग गई| जीजा और मेरे बीच का संवाद आगे क्या रंग दिखा सकता है यह तो मैंनें सोचा ही नहीं था पर रात को जीजा नें जानवी को जैसे चोदा था उसको देख कर तो दिल किया कि एक बार जीजा मेरी चूत में भी ठोक दे अपना किल्ला|
उसके बाद जीजा से उस दिन दो बार आमना सामना हुआ, जीजा नें पूछ ही लिया आखिर शर्त क्या होगी?

मैं दोनों बार शरमा गई, कुछ बोल ही नहीं पाई|
जब जीजा जानवी को लेकर विदा होनें लगे तो गाड़ी के पास जीजा नें फिर से पूछा तो मैंनें भी कह दिया:- अगर तुमनें मेरी चीखें निकलवा दी तो सारी उम्र तुम्हारी बन कर रहूँगी| जीजा खुश हो गए और शगुन में मुझे चांदी की अंगूठी देकर विदा हो गए|
जानवी की विदाई के बाद मैं भी विदा होकर अपनें पतिदेव के साथ अपनें ससुराल आ गई|
ससुराल आनें के बाद अब हर रात जब भी मेरे पति मुझे चोदते तो एकदम से जीजा की याद आ जाती|
कुछ दिन ऐसे ही बीत गए| अब पति देव भी अपनी नौकरी में ज्यादा व्यस्त हो गए| पहले तो महीनें में एक:-दो बार वो बाहर रहते थे पर अब तो वो हफ्ते में भी एक:-दो दिन बाहर रह जाते थे| मुझे अब अकेलापन महसूस होनें लगा था| इस अकेलेपन में मुझे पति के साथ:-साथ अब जीजा की भी याद सतानें लगी थी| बार बार उनका वो जानवी को रगड़:-रगड़ कर चोदना आँखों के सामनें फिल्म की तरह घूमनें लगता था|
चूत की खुजली जब मिटाए ना मिटे तो फिर जीजा भी पति से ज्यादा प्यारा लगनें लगता है और पतिदेव के पास तो चूत की खुजली मिटानें का समय ही नहीं था तो क्या करती, फ़िदा हो गई जीजा के लण्ड पर और चूत भी चुलबुलानें लगी जीजा का लण्ड लेनें को|
पर जीजा से मिला कैसे जाए| अब तो पतिदेव के गैर हाज़री में मैं बस यही सोचती रहती| कहते है सच्ची लगन से अगर मांगो तो भगवान भी मिल जाते हैं| बस एक दिन जीजा हमारे घर पर आये| उन्हें जयपुर में कुछ काम था| उनको तीन चार दिन रुकना था| मेरी जब जीजा से आँख मिली तो जीजा नें आँख मार दी| मेरे दिल में हलचल सी मच गई थी| पति देव और जीजा बैठ कर बातें कर रहे थे और मैं खाना बना रही थी|
जीजा नें बताया की उन्होंनें होटल में कमरा बुक करवा लिया है |
तो मेरे पति बहुत नाराज हुए, बोले:- घर के होते हुए होटल में रहो तो हमारे यहाँ होनें का क्या फायदा?
और उन्होंनें जीजा को घर पर रहनें के लिए मना लिया| मेरी तो बाँछें खिल उठी जीजा जो रहनें वाले थे तीन चार दिन मेरे पास|
रात को काफी देर तक बातें होती रही और फिर मैं जीजा का बिस्तर लगा कर कमरे में अपनें पति के पास सो गई| सच कहूँ तो दिल नहीं था पति के पास सोनें का, जीजा का लण्ड दिमाग में घूम रहा था|
सुबह होते ही मैं नाश्ता बनानें लगी| तभी मेरे लिए एक खुशखबरी आई, पति देव को अचानक टूर पर जाना पड़ गया था| मेरे तो दिल की धड़कन सिर्फ यह खबर सुन कर ही बढ़ गई थी|
पति जब जानें लगे तो जीजा बोला:- नेंहा अकेली है तो मेरा यहाँ रहना ठीक नहीं है तो मैं भी होटल में चला जाता हूँ|
पर इन्होंनें जीजा को बोल दिया:- चाहे कुछ भी हो, आपको घर पर ही रहना है| और फिर अब तो और भी ज्यादा जरूरी है क्यूंकि नेंहा अकेली है|
खैर जीजा मान गए तो मेरी जान में जान आई| यह कहानी आप अन्तर्वासना पोर्न स्टोरीज डॉट कॉम  पर पढ़ रहे हैं|
ये अपना सामन लेकर करीब दस बजे घर से चलनें लगे तो जीजा भी इनके साथ ही चले गए अपनें काम से|
सबके जानें के बाद मैं नहा धोकर तैयार हो गई और सोचनें लगी कि जीजा नें तो अब तक कुछ भी ऐसा नहीं जताया है कि वो मुझ से सेक्स करना चाहते हैं तो मैं क्यों इतनी उतावली हो रही हूँ उनसे चुदवानें को|
पर दिल तो कर रहा था ना जीजा से चुदवानें का|
मैं सोचनें लगी कि कैसे जीजा के साथ चुदाई का मज़ा लिया जाए| इसी उधेड़बुन में दोपहर हो गई| तभी जीजा का फोन आया कि वो कुछ देर में घर पर आ रहे हैं तो मैं उठ कर उनके लिए खाना बनानें लगी|
जब तक खाना तैयार हुआ तब तक जीजा भी आ गए|
बाहर गर्मी बहुत थी तो वो नहा कर केवल बनियान और लुंगी में खानें की मेज पर आ गए| मैं उनको खाना परोसनें लगी तो मैंनें देखा की जीजा की नजर मुझ पर जमी हुई थी|
मैं आपको बता दूँ की मैंनें उस दिन कपड़े भी खुले:-खुले से पहनें थे जो जीजा को उतेजित करनें के लिए ही थे|
मेरे बड़े गले के ब्लाउज में से मेरी चूचियाँ जो कि सभी कहते हैं कि क़यामत हैं, झांक रही थी| मैं खाना परोस रही थी और जीजा अपनी आँखें सेक रहे थे|
हम दोनों नें एक साथ बैठ कर खाना खाया| खानें के दौरान कोई खास बात नहीं हुई| खाना खत्म होनें के बाद जीजा अंदर कमरे में लेट गए| रसोई का काम निपटा कर मैं जानबूझ कर जीजा के पास कमरे में गई और पूछा:- जीजा कुछ और चाहिए क्या…?
जीजा तो जैसे इसी सवाल को सुननें के लिए तैयार बैठे थे, बोले:- हाँ… चाहिए तो पर… ||
जीजा नें अपनी बात को अधूरा छोड़ दिया| तभी जीजा नें बात को बदलते हुए एकदम से मुझे शर्त की याद दिलाई| पर मैं तो भूली ही नहीं थी वो बात| फिर भी मैंनें ऊपर के मन से कहा की जीजा ऐसी बातें तो शादी:-बियाह में होती रहती हैं|
“पर हम तो जब एक बार शर्त लगा लें तो पूरी करके ही छोड़ते हैं|” जीजा नें अपना इरादा स्पष्ट कर दिया|
मैं उठ कर बाहर जानें लगी तो जीजा नें मेरा हाथ पकड़ लिया| मेरा पूरा बदन झनझना गया| आखिर चाहती तो मैं भी यही थी| पर मैं हाथ छुड़वा कर अपनें कमरे में भाग गई| मेरी सांसें तेज तेज चल रही थी अब| तभी जीजा मेरे कमरे के बाहर आये और मुझे दरवाजा खोलनें को कहनें लगे और बोले:- शर्त लगाती हो और पूरा भी नहीं करती? यह तो गलत बात है| हम भी तो देखे की हमारी साली चुदाई में चिल्लाती है या नहीं?
“नहीं जीजा, यह ठीक नहीं है…|” सच कहूँ तो मेरे दिल में यही भी था कि मैं अपनें पति के साथ कैसे धोखा कर सकती हूँ पर एक बार जीजा से चुदवानें के लिए चूत भी फड़क रही थी|जीजा कुछ देर दरवाजे पर खड़े खड़े मुझे मानते रहे पर मैंनें दरवाजा नहीं खोला| कुछ देर बाद जब जीजा जानें लगे तो मैं अपनें दिल पर काबू नहीं रख पाई और मैंनें दरवाजा खोल दिया| मेरे दरवाजा खोलते ही जीजा एकदम खुश हो गए|
मैं दरवाजा खोल कर एक तरफ़ खड़ी हो गई, जीजा कमरे में अंदर आये और मेरे चेहरे को ऊपर उठा कर बोले:- नेंहा… सच में तुम एक क़यामत हो| जब से तुम्हें देखा है, मेरा लण्ड बस तुम्हारी याद में ही सर उठाये खड़ा रहता है| बस एक बार अपनी खूबसूरती का रसपान करनें दो|
मेरी तो जैसे आवाज ही बंद हो गई थी| तभी जीजा नें मेरे होंठों पर अपनें होंठ रख दिए तो दिल धाड़:-धाड़ बजनें लगा| जीजा नें होंठ चूसते चूसते चूचियाँ मसलनी शुरू कर दी| मेरी तो हालत खराब हो गई थी| पहली बार किसी गैर मर्द का हाथ मेरी जवानी पर था| जीजा नें अपनी बाहों में मुझे उठाया और ले जाकर बिस्तर लेटा दिया|
बिस्तर पर लिटा कर जीजा नें अपनी लुंगी खोल कर एक तरफ़ फैंक दी| जीजा का लण्ड अंडरवियर में भी बहुत खतरनाक लग रहा था|
फिर जीजा बिस्तर पर आकर मुझ से लिपट गया और मेरे बदन को चूमनें लगा| मैं मदहोश होती जा रही थी|
जीजा नें मेरा ब्लाउज खोल दिया और ब्रा में कसी चूचियों को चूमनें लगा| फिर जीजा नें मेरा ब्लाउज और ब्रा उतार दी और मेरी चूचियों को मुँह में भर भर कर चूसनें लगा| मेरी चूत पानी से सराबोर हो गई और उसमे लण्ड लेनें के लिए खुजली होनें लगी थी| दिल कर रहा था कि जीजा का लण्ड पकड़ कर घुसा लूँ अपनी चूत में और चुद जाऊँ अपनें सपनों के लण्ड महाराज से |
जीजा नें धीरे धीरे मेरे कपड़े मेरे बदन से अलग कर दिए| अब मैं जीजा के सामनें बिल्कुल नंगी पड़ी थी| शर्म के मारे मेरी आँख नहीं खुल रही थी| तभी जीजा नें मेरा हाथ पकड़ कर अपनें लण्ड पर रख दिया तो अहसास हुआ कि जीजा भी बिल्कुल नंगा हो चुका था और जीजा का मूसल जैसा लण्ड सर उठाये खड़ा था|
मैंनें भी अब शर्म करना ठीक नहीं समझा और पकड़ लिया जीजा का लण्ड अपनें हाथ में और लगी सहलानें|
एक गर्म लोहे की छड़ जैसा लण्ड था जीजा का| हाथ में पकड़ कर ही महसूस हो रहा था कि यह मेरी चीखें निकलवा देगा|
मुझे लगनें लगा था कि आज तो मैं शर्त हारनें वाली हूँ पर मैं तो चाहती ही यही थी कि जीजा मेरी चीखें निकलवाए|
वैसे मेरे पति का लण्ड भी कुछ कम नहीं था पर वो तो मुझे समय ही नहीं दे पाते थे| जब भी मुझे उनके लण्ड की जरूरत होती तो वो टूर पर गए होते थे और मैं अकेली चूत में उंगली डाल कर उनको याद करती रहती|
जीजा नें मेरे पास आकर लण्ड को मेरे मुँह के पास कर दिया| मैंनें आज से पहले कभी भी लण्ड मुँह में नहीं लिया था| पर जीजा नें लण्ड मेरे मुँह से लगा दिया तो मैंनें जीभ से चख कर देखा| उसका नमकीन सा स्वाद मुझे अच्छा लगा तो मैंनें लण्ड अपनें मुँह में ले लिया और चूसनें लगी| जीजा का मूसल सा लण्ड गले तक जा रहा था|
जीजा मस्ती में उसको अंदर धकेल रहे थे| कई बार तो वो मुझे अपनें गले में फंसता हुआ महसूस हुआ| पहली बार था तो उबकाई सी आनें लगी| जीजा नें मेरी हालत देखी तो लण्ड बाहर निकाल लिया|
जीजा नें अब मुझे लेटाया और मेरी चूत के आस पास जीभ से चाटनें लगे| मैं आनन्द:-सागर में गोते लगानें लगी| तभी जीजा की जीभ मेरी चूत के दानें को सहलाते हुए चूत में घुस गई|
मैं तो सिहर उठी|
पहली बार चूत पर जीभ का एहसास सचमुच बहुत मजेदार था| पति देव नें ना तो कभी मेरी चूत चाटी थी और ना ही कभी अपना लण्ड चुसवाया था| ये दोनों ही नए अनुभव थे मेरे लिए|
बहुत मज़ा आ रहा था और मैं मस्ती के मारे आह्हह्ह उह्ह्ह्ह म्ह्ह्ह्ह आह्ह्ह ओह्ह्ह्ह कर रही थी|
जीजा नें अपना लण्ड मेरे हाथ में दे दिया था और मैं उस लोहे जैसे लण्ड को अपनें हाथ से मसल रही थी|
तभी जीजा बोला:- अब चीखनें के लिए तैयार हो जाओ|
मैं कुछ बोल नहीं पाई बस जवाब में थोड़ा मुस्कुरा दी| अब तो मेरी चूत भी लण्ड मांग रही थी|
जीजा मेरी टांगों के बीच में आ गया और अपना मोटा लण्ड मेरी चूत पर घिसनें लगा|मेरी चूत पानी पानी हो रही थी, डर भी लग रहा था, मैं सोच में ही थी कि जीजा अब क्या करेगा?
मेरी चीखें निकलवानें के लिए की जीजा नें लण्ड को चूत पर टिका कर एक जोरदार धक्का लगा दिया और लण्ड चूत को लगभग चीरता हुआ अंदर घुसता चला गया और मेरे मुँह से एक जोरदार चीख निकल गई|
अभी पहले धक्के का दर्द खत्म भी नहीं हुआ था कि जीजा नें दो तीन धक्के एक साथ लगा दिए और मैं दर्द से दोहरी हो गई|
सच में बहुत खतरनाक लण्ड था जीजा का |
लगभग पूरा लण्ड अब चूत में था बस थोड़ा सा ही बाहर नजर आ रहा था| तभी जीजा नें सुपारे तक लण्ड को बाहर निकाला और फिर एक जोरदार धक्के के साथ वापिस चूत में घुसेड़ दिया| लण्ड अंदर जाकर सीधा बच्चेदानी से टकराया|
मैं मस्ती और दर्द दोनों के मिलेजुले एहसास में चीख उठी| पति का लण्ड था तो मस्त पर बच्चेदानी तक नहीं पहुँच पाया था आज तक| यह एहसास भी मेरे लिए बिल्कुल नया था|
कुछ देर ऐसे ही रहनें के बाद जीजा नें पहले धीरे:-धीरे धक्के लगाये और फिर पूरी गति में शुरू हो गया| लण्ड बार बार अंदर बच्चेदानी तक जा रहा था और मैं अपनें आप को रोक नहीं पाई चीखनें से|
मैं शर्त हार चुकी थी पर इस शर्त को हारनें का मुझे अफ़सोस बिल्कुल नहीं था| मैं तो अब खुद ही चाह रही थी कि जीजा जोर जोर से धक्के लगा कर फाड़ डाले मेरी चूत को| सच में बहुत मस्त चुदाई हो रही थी मेरी| इतना सख्त लण्ड पहली बार मेरी चूत में था|
कुछ देर बाद लण्ड नें अपनी जगह चूत में बना ली थी और अब मुझे दर्द नहीं हो रहा था पर मैं अब भी मस्ती के मारे चीख:-चिल्ला रही थी,”आह्ह्ह जीजा जोर से… फाड़ दे आज तो… तूनें तो मेरी सच में चीखें निकलवा दी मेरे राजा |”
मैं मस्ती के मारे बड़बड़ा रही थी| जीजा चुपचाप अपनें काम में लगा था और मेरी चूत का भुरता बना रहा था| जीजा पसीनें से तर हो चुका था| दस मिनट हो चुके थे उसको मुझे चोदते हुए| मूसल सा लण्ड और मस्त धक्के खानें के बाद अब मेरी चूत अब उलटी करनें वाली थी| और फिर वो ज्यादा देर अपनें आप को रोक नहीं पाई और झर झर झड़नें लगी| पानी छुटनें से चूत फच फच करनें लगी|
जीजा अब भी पूरे जोश के साथ चुदाई कर रहा था| कमरे में मादक आवाजें गूंज रही थी|
पानी निकलनें के बाद मेरा बदन कुछ देर के लिए ढीला हुआ था पर जीजा की जोरदार चुदाई नें मुझे एक बार फिर से गर्म कर दिया| और मैं गाण्ड उठा उठा कर लण्ड चूत में लेनें लगी|
जीजा नें मुझे अब घोड़ी बनाया और पीछे आ कर लण्ड मेरी चूत में डाल दिया| जीजा का लण्ड इतना सख्त था कि मैं उस पर टंगी हुई सी लग रही थी|
जीजा नें फिर से अपनी पूरी ताकत के साथ मेरी चुदाई शुरू कर दी और फिर पूरे आधा घंटा तक वो मुझे चोदता रहा| मैं दो बार झड़ गई थी इस बीच|
आधे घंटे के बाद जीजा का बदन अकड़नें लगा और उसके धक्कों की गति भी चरम पर थी| तभी जीजा के लण्ड नें गर्म:-गर्म माल मेरी चूत में पिचकारी मार कर छोड़ दिया| जीजा का वीर्य की गर्मी से मेरी चूत भी एक बार फिर पानी पानी हो गई थी| जीजा नें ढेर सारा माल मेरी चूत में भर दिया|
मैं इस चुदाई से परमसुख का एहसास कर रही थी| शर्त हार कर भी मैं बहुत कुछ जीत गई थी|
कुछ ही देर बाद जीजा फिर से मेरे पास आ गए और फिर से मेरे बदन को चूमनें चाटनें लगे| मैं हैरान थी कि अभी अभी यह इंसान आधे घंटे तक चोद कर हटा है और इतनी जल्दी फिर से तैयार हो गया|
मैंनें जोर देकर अपनी आँखे खोली तो देखा की जीजा का लण्ड अब फिर शवाब पर आ गया था| मेरी चूत को कपडे से साफ़ करके जीजा नें फिर से अपना लण्ड चूत में घुसा दिया| मैं चीखती रही और जीजा चोदता रहा| फिर तो सारी रात मेरी चीखें कमरे के अंदर गूंजती रही|

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