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“गुरुजी के आश्रम में रश्मि के जलवे”-4

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मैं अपनी ब्रा पैंटी धोनें लगी तभी दरवाज़े के ऊपर कुछ आवाज़ हुई| मैंनें पलटकर देखा समीर नें दरवाज़े के ऊपर मेरी दूसरी साड़ी और ब्लाउज लटका दिए थे पर पेटीकोट दरवाज़े से फिसलकर मेरी तरफ बाथरूम में फर्श पर गिर गया था|

समीर – सॉरी मैडम, पेटीकोट फिसल गया|

मैंनें देखा पेटीकोट फर्श में गिरनें से गीला हो गया है|

समीर – मैडम , पेटीकोट सूखी जगह पर गिरा या गीला हो गया ?

मैं क्या बोलती एक ही एक्सट्रा पेटीकोट लाई थी वो भी गीला हो गया| मैंनें झूठ बोल दिया वरना वो ना जानें फिर क्या क्या बोलता|

“ठीक है| सूखे में ही गिरा है|”

समीर – चलिए शुक्र है| मुझे ध्यान से रखना चाहिए था|

तब तक मैंनें अपनें अंडरगार्मेंट्स धो लिए थे|

फिर मैं अपनें बदन में लिपटा टॉवेल उतारकर अपनें हाथ पैर पोछनें लगी| मेरे हिलनें से मेरी बड़ी चूचियाँ भी हिल डुल रही थी , बड़ा मिरर होनें से उसमें सब दिख रहा था| मैंनें देखा मेरे निपल तनें हुए हैं और दो अंगूर के दानों जैसे खड़े हुए हैं|

फिर मैंनें दरवाज़े के ऊपर से ब्लाउज उठाया और पहननें लगी| मैं बिना ब्रा के ब्लाउज नही पहनती पर आज ऐसे ही पहनना पड़ रहा था| बदक़िस्मती से मेरे सफेद ब्लाउज का कपड़ा भी पतला था| मैंनें मिरर में देखा सफेद ब्लाउज में मेरे भूरे रंग के ऐरोला और निपल साफ दिख रहे हैं| मैं अपनें को कोसनें लगी की ये वाला ब्लाउज मैं क्यूँ लेकर आई पर तब मुझे क्या पता था की बिना ब्रा के ब्लाउज पहनना पड़ेगा|

समीर – मैडम , जल्दी कीजिए| मुझे गुरुजी के पास भी जाना है|

मैंनें जल्दी से गीला पेटीकोट पहन लिया | और कोई चारा भी नही था| बिना पेटीकोट के साड़ी में बाहर कैसे निकलती| फिर मैंनें साड़ी पहन के ब्लाउज को साड़ी के पल्लू से ढक लिया|

जब मैं बाथरूम से बाहर आई तो समीर मुझे देखकर मुस्कुराया| तभी मैं लड़खड़ा गयी , जिससे पतले ब्लाउज में मेरी चूचियाँ उछल गयी| मैंनें देखा समीर की नज़रों नें मेरी चूचियों के हिलनें को मिस नही किया| समीर के सामनें बिना ब्रा के मुझे बहुत अनकंफर्टेबल फील हुआ और मैंनें जल्दी से अपना पल्लू ठीक किया और जितना हो सकता था उतना ब्लाउज ढक दिया|

फिर मैंनें अपनें धोए हुए अंडरगार्मेंट्स समीर को दे दिए| मुझे नितंबों और जांघों पर गीलापन महसूस हो रहा था क्यूंकी पेटीकोट उन जगहों पर गीला हो गया था| अजीब सा लग रहा था पर क्या करती वैसी ही पहनें रही|
समीर – ठीक है मैडम , अब आप आराम कीजिए|

समीर के जानें के बाद मैंनें जल्दी से कमरे का दरवाज़ा बंद किया और गीला पेटीकोट उतार दिया| इस बार मैंनें साड़ी नही उतारी| साड़ी को कमर तक ऊपर करके पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया| पेटीकोट गीला होनें से मेरे भारी नितंबों में चिपक रहा था , तो मुझे खींचकर उतारना पड़ा| फिर पेटीकोट को सूखनें के लिए फैला दिया| अब मैं बिना ब्रा, पैंटी और पेटीकोट के सिर्फ़ ब्लाउज और साड़ी में थी|

करीब एक घंटे तक मैंनें आराम किया| तब तक पेटीकोट भी सूख गया था| मैं सोच रही थी की अब तो पेटीकोट लगभग सूख ही गया है , पहन लेती हूँ| तभी किसी नें दरवाज़ा खटखटा दिया|

“प्लीज़ एक मिनट रूको, अभी खोलती हूँ|”

मैंनें साड़ी ऊपर करके जल्दी से पेटीकोट पहना और फिर साड़ी ठीक ठाक करके दरवाज़ा खोल दिया| दरवाज़े पे परिमल खड़ा था|

परिमल – मैडम , दीक्षा के लिए गुरुजी आपका इंतज़ार कर रहे हैं| समीर नें मुझे भेजा है आपको लानें के लिए|

परिमल नाटे कद का था , शायद 5” से कम ही होगा , उसकी आँखों का लेवल मेरी छाती तक था| इसलिए मैं इस बात का ध्यान रख रही थी की मेरी चूचियाँ ज़्यादा हिले डुले नही|

“ठीक है| मैं तैयार हूँ| लेकिन समीर नें कहा था की दीक्षा से पहले नहाना पड़ेगा|”

परिमल – हाँ मैडम , दीक्षा से पहले स्नान करना पड़ता है | पर वो स्नान खास किस्म की जड़ी बूटियों को पानी में मिलाकर करना पड़ता है| आप चलिए , वहीं गुरुजी के सामनें स्नान होगा|

उसकी बात सुनकर मैं शॉक्ड हो गयी|

“क्या ??? गुरुजी के सामनें स्नान ???? ये मैं कैसे कर सकती हूँ ?? क्या मैं छोटी बच्ची हूँ ?? “

परिमल – अरे नही मैडम| आप ग़लत समझ रही हैं| मेरे कहनें का मतलब है गुरुजी खास किस्म का जड़ी बूटी वाला मिश्रण बनाते हैं, आपके नहानें से पहले गुरुजी कुछ मंत्र पढ़ेंगे| दीक्षा वाले कमरे में एक बाथरूम है , आप वहाँ नहाओगी|

परिमल के समझानें से मैं शांत हुई|

परिमल – मैडम किसनें कहा है की आप छोटी बच्ची हो ? कोई अँधा ही ऐसा कह सकता है|
फिर थोड़ा रुककर बोला,” लेकिन मैडम, अगर आप स्कूल गर्ल वाली ड्रेस पहन लो तो आप छोटी बच्ची की जैसी लगोगी, ये बात तो आप भी मानोगी|”

परिमल मुस्कुराया| मैं समझ गयी परिमल मुझसे मस्ती कर रहा है | लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ की मुझे भी उसकी बात में मज़ा आ रहा था| स्कूल यूनिफॉर्म की स्कर्ट तो मेरे बड़े नितंबों को ढक भी नही पाएगी , लेकिन फिर भी परिमल मुझसे ऐसा मज़ाक कर रहा था| ना जानें क्यूँ पर उसकी ऐसी बातों से मेरे निपल और चूचियाँ कड़क हो गयीं , शायद खुद को एक छोटी स्कूल ड्रेस में कल्पना करके , जो मुझे ठीक से फिट भी नही आती| परिमल के छोटे कद की वजह से उसकी आँखें मेरी कड़क हो चुकी चूचियों पर ही थी|

मैंनें भी मज़ाक में जवाब दिया,”समीर नें कहा है की आश्रम से मुझे साड़ी मिलेगी| अब तुम मेरे लिए कहीं स्कूल ड्रेस ना ले आओ|”

परिमल हंसते हुए बोला,”मैडम , आश्रम भी तो स्कूल जैसा ही है, तो स्कूल ड्रेस पहननें में हर्ज़ क्या है| लेकिन अगर आप पहन ना पाओ तो फिर मुझे बुरा भला मत कहना|”

पता नही मैं परिमल के साथ ये बेकार की बातचीत क्यों कर रही थी पर मुझे मज़ा आ रहा था| शायद उसके छोटे कद की वजह से मैं उससे मस्ती कर रही थी| उससे बातों में मैं ये भूल ही गयी थी की मैं आश्रम में आई क्यूँ हूँ| मैं यहाँ कोई पिकनिक मनानें नही आई थी , मुझे तो माँ बननें के लिए उपचार करवाना था| लेकिन पहले समीर के साथ और अब परिमल के साथ हुई बातचीत से मेरा ध्यान भटक गया था|

मुझे ये अहसास हुआ की ना सिर्फ़ मेरे निपल कड़क हो गये हैं बल्कि मेरा दिल भी तेज तेज धड़क रहा था| शायद एक अनजानें मर्द के सामनें बिना ब्रा के सिर्फ़ ब्लाउज पहनें होनें से एक अजीब रोमांच सा हो रहा था|

फिर मैंनें पूछा,” तुम्हारी बात सही है की आश्रम भी एक स्कूल जैसा ही है , पर मैं स्कूल ड्रेस क्यूँ नही पहन सकती ?”

इसका जो जवाब परिमल नें दिया वैसा कुछ किसी भी मर्द नें आजतक मेरे सामनें नही कहा था|

परिमल – क्यूंकी स्कूल यूनिफॉर्म तो स्कूल गर्ल के ही साइज़ की होगी ना मैडम|
मेरे पूरे बदन पर नज़र डालते हुए परिमल नें जवाब दिया|
फिर बोला,”अगर मान लो मैं आपके लिए स्कूल ड्रेस ले आया , सफेद टॉप और स्कर्ट| मैं शर्त लगा सकता हूँ की आप इसे पहन नही पाओगी| अगर आपनें स्कर्ट में पैर डाल भी लिए तो वो ऊपर को जाएगी नही क्यूंकी मैडम आपके नितंब बड़े बड़े हैं| और टॉप का तो आप एक भी बटन नही लगा पाओगी| अगर आप ब्रा नही पहनी हो तब भी नही , जैसे अभी हो| तभी तो मैंनें कहा था मैडम , की अगर आप पहन ना पाओ तो मुझे बुरा भला मत कहना|”

उसकी बात से मुझे झटका लगा| इसको कैसे पता की मैंनें ब्रा नही पहनी है| हे भगवान ! लगता है पूरे आश्रम को ये बात मालूम है|

“उम्म्म………||मैं नही मानती| स्कर्ट तो मैं पहन ही लूँगी , हो सकता है टॉप ना पहन पाऊँ| भगवान का शुक्र है की आश्रम के ड्रेस कोड में स्कूल यूनिफॉर्म नही है|” मैं खी खी कर हंसनें लगी , परिमल भी मेरे साथ हंसनें लगा|

परिमल की हिम्मत भी अब बढ़ती जा रही थी क्यूंकी वो देख रहा था की मैं उसकी बातों का बुरा नही मान रही हूँ और उससे हँसी मज़ाक कर रही हूँ| ऐसी बेशर्मी मैंनें पहले कभी नही दिखाई थी पर पता नही क्यूँ बौनें परिमल के साथ मुझे मज़ा आ रहा था| इन बातों का मेरे बदन पर असर पड़नें लगा था| मेरी साँसे थोड़ी भारी हो चली थी| मेरी चूचियाँ कड़क हो गयी थीं और मेरी चूत भी गीली हो गयी थी| अब सीधा खड़ा रहना भी मेरे लिए मुश्किल हो रहा था , इसलिए साड़ी ठीक करनें के बहानें मैंनें अपनें नितंब दरवाज़े पर टिका दिए|

परिमल – मैडम , अभी हमको देर हो रही है| दीक्षा के बाद मैं आपको स्कूल ड्रेस लाकर दूँगा फिर आप पहन के देख लेना की मैं सही हूँ या आप|

परिमल मुझे दाना डाल रहा है की मैं उसके सामनें स्कूल ड्रेस पहन के दिखाऊँ , ये बात मैं समझ रही थी| पर इस बौनें आदमी को टीज़ करनें में मुझे भी मज़ा आ रहा था|

“सच में क्या ? आश्रम में तुम्हारे पास स्कूल ड्रेस भी है ? ऐसा कैसे ?”

परिमल – मैडम ,कुछ दिन पहले गुरुजी का एक भक्त अपनी बेटी के साथ आया था| लेकिन जाते समय वो एक पैकेट यहीं भूल गया जिसमे उसकी बेटी की स्कूल ड्रेस और कुछ कपड़े थे| वो पैकेट ऑफिस में ही रखा है| लेकिन अभी देर हो रही है मैडम, गुरुजी दीक्षा के लिए इंतज़ार कर रहे होंगे|

हमारी छेड़खानी कुछ ज़्यादा ही खिंच गयी थी | आश्रम में किसी लड़की की स्कूल यूनिफॉर्म होगी ये तो मैंनें सोचा भी नही था| लेकिन बौनें परिमल की मस्ती का मैंनें भी पूरा मज़ा लिया था|

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