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“एक भँवरे नें एक कली को फूल बना दिया”-1

मेरा नाम जय है! मैं 25 साल का तंदरुस्त! 5’11” रंग गेहुंआ! फिट बॉडी का आदमी हूँ| मेरी पत्नी जुली 20 साल की! स्वस्थ! 5’5″ रंग गोरा और फिगर 32-28-34 है|
पंजाब के एक बड़े शहर में मेरा अपना एक छोटा सा सॉफ़्टवेयर एंड हार्डवेयर पार्ट्स सप्लाई का बिज़नेंस है जिससे मुझे सब ख़र्चे और टैक्स इत्यादि निकाल के करीब दस से बारह लाख रुपये सलाना की कमाई हो जाती है| एक अपना ऑफिस है! गोदाम है! वर्कशॉप है! 9-10 लोगों का स्टाफ़ है! अपना घर है! कार है|
हमारे दो बच्चे हैं! एक बेटी 1साल की और एक बेटा 3साल का| हमारी 4 साल की शादीशुदा जिंदगी में हमारी सैक्स लाइफ बहुत ही बढ़िया है| बिस्तर में जुली और मैं नए नए तज़ुर्बे करते ही रहते हैं! कभी-कभी कोई तज़ुर्बा बैक-फ़ायर भी कर जाता है पर ओवरआल सब मस्त है|
यह घटना आज से 3 साल पहले की है! जब मेरी माँ जो मेरे साथ ही रहती थी! की अचानक मृत्यु हो गई| पिता जी आठ साल पहले ही चल बसे थे लिहाज़ा जुली! मेरी पत्नी अचानक से घर में बिल्कुल अकेली हो गई|
मैं तो सुबह का निकला शाम को घर आता था! पीछे दोनों बच्चे स्कूल चले जाते थे और जुली सारा दिन घर में अकेली रहती थी! अगर बाजार भी जाना हो तो घर ताला लगा के जाओ|
उन दिनों शहर में चोरियां बहुत होती थी और घर के मेनगेट पर लगा ताला तो जैसे चोरों को खुद आवाज़ मार कर बुलाता है|
एक दिन जुली किसी काम से बाजार गई पर रास्ते में कुछ भूला याद आनें पर आधे रास्ते से ही घर वापिस लौटी तो देखा कि चोरों नें मेनगेट का ताला तोड़ रखा था पर इससे पहले कि चोर अपनी किसी कारगुजारी को अंजाम देते! जुली घर लौट आई और चोरों को फ़ौरन वहाँ से भागना पड़ा|

पर इस काण्ड के बाद जुली बहुत डरी-डरी सी रहनें लगी जिस का सीधा असर हमारे घर-परिवार पर और हमारी सेक्स-लाइफ़ पर पड़नें लगा|
अपनी सेक्स लाइफ बिगड़ते देख मुझे बहुत कोफ़्त होती… पर क्या करता?
अब मुझे इस समस्या का कोई समाधान सोचना था और बहुत जल्दी ही सोचना था पर कुछ सूझ नहीं रहा था और फिर एक दिन जैसे भगवान् नें खुद इस समस्या का समाधान भेज दिया|
मेरी बड़ी साली साहिबा जिनकी शादी मेरे शहर से 25-30 किलोमीटर दूर एक कस्बे में एक खाते पीते आढ़ती परिवार में हुई थी! की बेटी प्रियंका नें B.Com पास कर ली थी लेकिन समस्या यह थी कि क़स्बे में कोई अच्छा कॉलेज नहीं था जहां मास्टर्स की जा सके और मेरे शहर में कई अच्छे कॉलेजों समेत यूनिवर्सिटी भी थी|
लिहाज़ा प्रियंका नें मेरे शहर में एक नामी गिरामी कॉलेज में M.Com में ऐडमिशन ले लिया था लेकिन किस्मत से प्रियंका को हॉस्टल में जगह नहीं मिल पाई थी सो मेरी साली साहिबा थोड़ी परेशान सी थी कि एक दिन मैं और जुली उनके घर उनसे मिलनें जा पहुंचे|
बातों बातों में इस बात का ज़िक्र भी आया तो मेरी पत्नी नें प्रियंका को अपनें घर रहनें के लिए कह दिया| मैंनें भी सोचा कि चलो ठीक ही है! कम से कम जुली एक नार्मल औरत सा जीवन तो जियेगी|
मेरी शादी के समय प्रियंका सात-आठ साल की पतली सी! मरगिल्ली सी लड़की थी जो हर वक़्त या तो रोती रहती थी या रोनें को तैयार रहती थी| बहुत दफा तो वो घर आये मेहमानों के सामनें ही नहीं आती थी और हम पर तो साहब ! हर वक़्त अपनी पत्नी का नशा सवार रहता था! मैंनें भी प्रियंका पर पहले कभी ध्यान नहीं दिया था|
लब्बोलुआब ये कि यह फाइनल हो गया कि प्रियंका हमारे घर रह कर ही M.Com करेगी| फैसला ये हुआ कि मम्मी वाला कमरा प्रियंका को दे दिया जाए ताकि वो अपनी पढ़ाई बे रोक-टोक कर सके|
इस बात से जुली इतनी खुश हुई कि उस रात बिस्तर में जुली नें कहर बरपा दिया| ऐसा बहुत दिनों बाद हुआ था लिहाज़ा मैं भी खुश था|
एक हफ्ते बाद प्रियंका हमारे घर आ गई|
उस रात डाइनिंग टेबल पर मैंनें पहली बार प्रियंका को गौर से देखा| डेढ़ पसली की मरघिल्ली सी! रोंदू सी लड़की! माशा-अल्लाह ! जवान हो गई थी! करीब 5′-4″ कद! कमान सा कसा हुआ पतला लेकिन स्वस्थ शरीर! रंग गेहुँआ! लंबे बाल! सुतवाँ नाक! पतले गुलाबी लेकिन भरे-भरे होंठ! तीखे नैननक्श और काले कजरारे नयन!
फ़िगर अंदाजन 32-28-32था|
यूं मैं कोई सैक्स-मैनियॉक नहीं पर ईमानदारी से कहूँ तो उस वक़्त मन ही मन मैं प्रियंका के नंगे जिस्म की कल्पना करनें लगा था|
खैर जी ! डिनर हुआ| सब लिविंग रूम में आ बैठे! बच्चे TV देखनें लगे! प्रियंका और जुली दोनों बातें करनें लगी और मैं इजी चेयर पर बैठा किताब पढ़नें लगा पर मेरे कान तो उन दोनों की बातों पर ही लगे हुए थे|
मैंनें नोटिस किया कि बोल तो सिर्फ जुली ही रही थी और प्रियंका तो बस हाँ-हूँ कर रही थी|
खैर! धीरे धीरे प्रियंका हमारे परिवार का अंग होती चली गई! दोनों बच्चों को प्रियंका पढ़ा देती थी| रात का डिनर पकाना भी प्रियंका की जिम्मेवारी हो गई थी लेकिन अब भी प्रियंका मेरे सामनें कम ही आती थी! आती भी थी तो मुझ से बहुत कम बोलती थी! बस हां जी… नहीं जी… ठीक है जी!
मैं तो इसी बात में खुश था कि मुझे मेरी पत्नी का ज्यादा समय मिल रहा था और मेरी सेक्स लाइफ नार्मल से भी अच्छी हो गई थी| धीरे धीरे समय गुजरनें लगा|
शुरू शुरू में तो प्रियंका हर शनिवार अपनें घर चली जाया करती थी और सोमवार सवेरे सीधे कॉलेज आकर शाम को घर आती थी लेकिन धीरे धीरे प्रियंका का अपनें घर जाना कम होनें लगा| अब प्रियंका दो महीनें में एक बार या बड़ी हद दो बार अपनें घर जाती थी|
फर्स्ट ईयर के फाइनल एग्जाम ख़त्म होनें के बाद प्रियंका तीन महीनें के लिए अपनें घर चली गई| करीब पांच हफ्ते बाद एक रात! एक रस्मी से अभिसार से असंतुष्ट सा मैं जुली के नग्न शरीर पर हाथ फेर रहा था कि जुली नें मुझ से कहा- जय… चलो! कल जाकर प्रियंका को ले आयें| प्रियंका के बिना मेरा दिल नहीं लग रहा और दोनों बच्चे भी उदास हैं|
मैंनें हामी भर दी|
अगले दिन हम दोनों जाकर प्रियंका को ले आये| खुश जुली नें उस रात अभिसार में मेरे छक्के छुड़ा दिए! जुली नें मेरा लिंग चूस-चूस कर मुझे स्खलित किया और बाद में खुद मेरा लिंग पकड़ कर! उस पर तेल लगाया और अपनें हाथ से मेरा लिंग अपनी गुदा पर रख कर मुझे गुदा मैथुन के लिए आमंत्रित किया! रतिक्रिया के किसी भी आसन को उसनें ‘ना’ नहीं कहा बल्कि दो कदम आगे जाकर कुछ अपनी ओर से और नया कर दिया|
ख़ैर! जिंदगी वापिस पटरी आ गई थी लेकिन अब एक फर्क था! अब प्रियंका सारा दिन घर पर ही रहती थी! उसके कॉलेज खुलनें में अभी डेढ़ महीना बाकी था|

मैं दोपहर को खाना खानें घर आता था! पहले जब प्रियंका कॉलेज गई होती थी तो मैं अक्सर दोपहर को ही जुली को थाम लिया करता था! कभी रसोई में! कभी स्टोर में! कभी लॉबी में और कभी ड्राइंग रूम में भी… एक-आध बार तो बाथरूम में शावर के नीचे भी!
प्रियंका के आनें से दोपहर की इन तमाम खुराफातों में लगाम लग गई थी| कोफ़्त होती थी कभी कभी पर क्या किया जा सकता था?

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फिर भी दांव लगा कर कभी-कभार मैं जुली से छोटी-मोटी चुहलबाज़ी तो कर ही लेता था! जैसे पास से गुज़रती जुली के नितम्बों को सहला देना! उसके उरोजों पर हल्के से हाथ फेर देना! निप्पल दबा देना! रसोई में सब्ज़ी बनाती जुली से सट कर खड़े होकर कढ़ाई में सब्ज़ी देखनें के बहानें जुली के कान के पास एक छोटा सा चुम्बन ले लेना या उसकी साड़ी के पल्लू की आड़ में उसका हाथ पकड़ कर अपनें लिंग पर दबा देना|
मेरे ऐसा करनें पर जुली दिखावटी गुस्सा दिखाती जरूर थी लेकिन तिरछी आँखों से मुझे देखते हुये उसके होंठों पर स्वीकृति की एक मौन सी मुस्कान भी होती थी|
दिन बढ़िया गुज़र रहे थे लेकिन मैं प्रियंका में और उसके मेरे प्रति व्यवहार में कुछ कुछ फर्क महसूस कर रहा था| मैं अक्सर नोट करता कि डाइनिंग टेबल पर खाना खाते वक़्त या लिविंग रूम में टी.वी देखते वक़्त या कभी कभी कोई किताब पढ़ते-पढ़ते मैं जब जब सिर उठा कर प्रियंका की ओर देखता तो उसे मेरी ओर ही देखते पाता और जैसे ही मेरी प्रियंका की नज़र से नज़र मिलती तो वो या तो नज़र नीची कर लेती या कहीं और देखनें लगती|
मुझे कुछ समय के लिए उलझन तो होती पर जल्दी ही मेरा ध्यान किसी और बात पर चला जाता और बात आई-गई हो जाती|
बरसात का मौसम आ गया था! बहुत निकम्मी किस्म की गर्मी पड़ रही थी! जिस दिन बरसात होती उस दिन तो मौसम ठीक रहता! अगले दिन जब धूप निकलती तो उमस के मारे जान निकलनें लगती! जगह जगह खड़ा पानी बास मारनें लगता और मक्खी-मच्छर पैदा करनें की ज़िंदा फैक्टरी बन जाता|
एयर कंडीशनड कमरों में ही जिंदगी सिमटी पड़ी थी|
उसी मौसम में एक दिन प्रियंका के कमरे के A.C की गैस लीक हो गई| बच्चों का बैडरूम छोटा था और उसमें तीसरे बेड की जगह नहीं थी! ड्राइंग रूम और लिविंग रूम तो रात को सोनें के किये डिज़ाइन्ड ही नहीं थे तो एक ही चारा बचता था कि जब तक प्रियंका के कमरे का A.C रिपेयर हो कर नहीं आता! प्रियंका का बेड हमारे बैडरूम में हमारे बेड की बगल में ही लगाया जाए|
ऐसा ही हुआ और ऐसा होनें से हम पति-पत्नी की रात वाली रासलीला पर टेम्परेरी बैन लग गया था!
पर क्या करते… मज़बूरी थी|
हमारे बैडरूम में बेड के साथ ही लेफ्ट साइड बाथरूम का दरवाज़ा था और मेरी पत्नी बैड के लेफ्ट साइड सोना पसंद करती थी और मैं राईट साइड सोता था! हमारे बेड के साथ ही राईट साइड प्रियंका का फोल्डिंग बेड लगाया गया था| रात आती! खाना-वाना खा कर हम लोग सोनें के लिए बैडरूम में आते|
जुली मेरे बायें और प्रियंका मेरे दायें… ये दोनों बातें करनें लगती और मैं बीच में ही सो जाता|
दो-एक दिन बाद एक रात को अचानक मेरी आँख खुली तो पाया कि प्रियंका बाईं करवट सो रही थी यानी उसका मुंह मेरी ओर था और उसका दायां हाथ मेरी छाती पर था|
मैंनें सिर उठा कर देखा तो जुली को घनघोर नींद के हवाले पाया| मैंनें धीरे से प्रियंका का हाथ अपनी छाती से उठाया और उस हाथ उस की बगल पर रख दिया|
पर नींद बहुत देर तक नहीं आई! दिल में बहुत उथल-पुथल सी चल रही थी|
क्या प्रियंका नें जानबूझ कर ऐसा किया था? अगर हाँ तो क्यों? क्या प्रियंका मेरे साथ… सोच कर झुरझुरी सी उठी और अचानक ही मेरे लिंग में तनाव आ गया|
इसी उहपोह में जानें कब मेरी आँख लग गई|
दिन चढ़ा! सब कुछ अपनी जगह पर! हर चीज़ नार्मल सी थी पर मेरे दिल में इक अनजान सी फ़ीलिंग थी! रह रह कर प्रियंका के हाथ की छुअन मुझे अपनी छाती पर फील हो रही थी और रह रह कर मेरे लिंग में तनाव आ रहा था|
उस दिन मैंनें अपनी शादी के बाद पहली बार बाथरूम में नहाते समय हस्त मैथुन किया|
अगली रात आई! फिर वही सोनें का अरेन्जमेन्ट! जुली डबलबेड के बाईं ओर! मैं दाईं ओर और प्रियंका का फोल्डिंग बेड हमारे डबलबेड के दाईं ओर सटा हुआ और मुझ में और प्रियंका में ज्यादा से ज्यादा डेढ़ फुट का फासला|
आज मैं अभी किताब ही पढ़ रहा था कि ये दोनों सोनें की तैयारी करनें लगी| जल्दी सोनें का कारण पूछनें पर प्रियंका नें बताया कि आज दोनों बाज़ार गईं थी! थक गई हैं|
पन्द्रह बीस मिनट बाद मैंनें लाईट बंद की और खुद उल्टा हो कर सोनें की कोशिश करनें लगा! उल्टा बोले तो पेट के बल! पन्द्रह-बीस मिनट ही बीते होंगे कि प्रियंका का हाथ आज़ फिर से मेरे ऊपर आ पड़ा लेकिन आज़ चूंकि मैं उल्टा पड़ा था सो इस बार उसका हाथ मेरी पीठ पर पड़ा|
तीन चार मिनट बाद प्रियंका नें अपना हाथ मेरी पीठ से उठा लिया और खुद सीधी होकर! मतलब पीठ के बल लेट कर सोनें का उपक्रम करनें लगी| उसका मेरी ओर वाला हाथ मतलब बायां हाथ उसके सिर के पास सिरहानें पर ही पड़ा था| मेरा मुंह प्रियंका की ओर ही था और मेरा और प्रियंका का फासला ज्यादा से ज्यादा डेढ़ फुट का रहा होगा|
अचानक मैंनें अपनें बायें हाथ को प्रियंका पर रख दिया… मेरा दिल पसलियों में धाड़-धाड़ बज़ रहा था|
कोई हरकत नहीं.. ना मेरी ओर से… ना प्रियंका की ओर से…
अचानक प्रियंका नें सिर उठाया और मेरी ओर ध्यान से देखनें लगी! मींची आँखों में मैं सोनें की एक्टिंग करनें लगा| एक डेढ़ मिनट मुझे ध्यान से देखनें के बाद जब उसे यकीन हो गया कि मैं गहरी नींद में सो रहा था तो उसनें अपनें हाथ पर जो मेरा हाथ थामे था! चादर डाल थी और चादर के नीचे मेरे हाथ की उँगलियों को एकके बाद एक करके चूमनें लगी|
उम्म्ह… अहह… हय… याह… उत्तेजना के मारे मेरा बुरा हाल था! तनाव के कारण मेरा लिंग जैसे फटनें की कगार पर था| मैं प्रियंका के हाथ का स्पंदन महसूस कर सकता था पर मैंनें अपनी ओर से कोई हरकत नहीं की|
करीब आधे घंटे बाद प्रियंका नें ऐसा करना बंद किया|
मैंनें सर उठा कर देखा तो लगा कि प्रियंका सो गई थी शायद! मेरा हाथ अब भी उसके हाथ में जकड़ा हुआ था| ऐसे ही जानें कब मैं सचमुच नींद के आगोश में चला गया|
सुबह उठा तो पाया कि जुली और प्रियंका उठ कर कब की जा चुकी थी! तभी जुली अख़बार ले कर आ गई| दिल में अनाम सी ख़ुशी लिए मैंनें जिंदगी का एक नया दिन शुरू किया|
तभी प्रियंका भी बैडरूम में चाय की ट्रे लेकर आई! नहाई-धोई! सफ़ेद पजामी सूट में ताज़ा ताज़ा शैम्पू किये बालों से मनभावन सी खुशबू उड़ाती एकदम ताज़ा दम! सफ़ेद सूट में से सफ़ेद ब्रा साफ़ साफ़ उजाग़र हो रही थी|
जैसे ही मेरी प्रियंका की आँख से आँख मिली! प्रियंका की नज़र झुक गई और क्षण भर को ही ग़ुलाबी भरे भरे होंठों पर एक गुप्त सी मुस्कान आकर लुप्त हो गई|
रात वाली बात याद आते ही मेरे लिंग में जान सी आनें लगी|
जैसे ही प्रियंका बैठनें लगी तो मेरी वाली साइड से सफ़ेद पजामी में से गहरे रंग की पैंटी साफ़ साफ़ झलकनें लगी| एक क्षण में ही मेरा लिंग फुल जोश में फुंफ़कारनें लगा और मैंनें अपनें साथ बैठी जुली का हाथ चादर के अंदर ही पकड़ कर अपनें लिंग पर रख कर ऊपर से अपनें हाथ से दबा लिया|
जुली चिंहुक उठी! लगी अपना हाथ छुड़ानें की कोशिश करनें… लेकिन मैं जानें दूं तब ना! जैसे ही जुली नें मुझे देख कर आँखें तरेरी तो प्रियंका नें पूछा- क्या हुआ मौसी?
‘कुछ नहीं…’ कह कर जुली नें अपना हाथ छुड़ानें की कोशिश बंद कर दी और चादर के नीचे से मेरा लिंग जोर से पकड़ लिया|
मैं अपनें मुक्त हुए हाथ से जुली की जाँघ जांचनें लगा|
सारा दिन जैसे हवाओं के हिण्डोले पर बीता! जो मेरे और प्रियंका के बीच चल रहा था! उस बारे में सारा दिन मेरे अपनें ही अंदर तर्क कुतर्क चलते रहे|
एक बात तो पक्की थी कि प्रियंका की तो ख़ैर कच्ची उम्र थी पर मैं जो कर रहा था वो सामाजिक और नैतिक दृष्टि से गलत था और मैं खुद जानता था कि मैं गलत कर रहा था|
लेकिन वो जैसा कहते हैं कि गुनाह की लज़्ज़त मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी|
साली की बेटी की कच्ची उम्र की लज़्ज़त मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी! मैंनें सोच लिया था कि आज से मैं प्रियंका वाली साइड सोऊंगा ही
नहीं लेकिन जैसे-जैसे दिन बीत रहा था! मेरा पक्का इरादा डाँवाडोल हो रहा था|
शाम आई… मैं घर आया! आते ही प्रियंका मेरे लिए पानी का गिलास ले कर आई! ग़िलास पकड़ते वक़्त मैंनें प्रियंका की आँखों में देखा!
प्रियंका नें शर्मा कर नज़र नीची कर ली और खाली गिलास ले कर चली गई|
आज रात तो कुछ हो कर रहना था! ऐसी सोच आते ही पतलून के अंदर ही मेरा लिंग भयंकर रौद्र रूप में आ गया! रात की प्रतीक्षा में
समय काटना मुश्किल हो गया था|
शाम को बाथरूम में नहाते समय मैंनें एक बार फिर ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ किया|

डिनर करते समय मैंनें रह रह कर आती जाती जुली के नितंबों पर चुटकी काटी| डिनर टेबल पर ही जुली नें मुझ से प्रियंका के कमरे के
A.C के बारे में पूछा कि कब ठीक हो के आएगा?
यूं मैंनें कह तो दिया कि एक-आध दिन में आ जाएगा पर मेरा इरादा तो प्रियंका के कमरे के A.C को कयामत के दिन तक ना लानें का
हो रहा था|राम राम कर के डिनर निपटाया|
वैसे हम फ़ैमिली के सब लोग डिनर के बाद लिविंग रूम बैठ कर कुछ देर गप्पें हांकते है लेकिन उस दिन मैं सीधा अपनें बैडरूम में
चला गया|
बाथरूम में ब्रश करनें के बाद मैंनें अपना अंडरवियर उतार कर वाशिंग-बास्केट में डाल दिया और पजामा बिना अंडरवियर के पहन कर
सीधे अपनें बिस्तर पर जा कर A.C का टेम्प्रेचर 20 डिग्री पर सेट कर दिया|
जुली और प्रियंका अभी बैडरूम में आईं नहीं थी! मैंनें बिस्तर में लेट कर आँखें बंद कर ली! बीसेक मिनट बाद दोनों बैडरूम में आईं और
मुझे सोता पाया|
10-15 मिनट हल्की-फ़ुल्की बाद गप्पें हांकनें के बाद दोनों सोनें की तैयारी करनें लगी और बैडरूम की लाइट बंद कर दी गई|
जैसे ही बैडरूम की लाइट बंद हुई मैंनें तड़ाक से आँखें खोल ली और प्रियंका को देखनें लगा| प्रियंका तब अपनें बिस्तर पर लेटनें की तैयारी
कर रही थी और अपनें बाल बाँध रही थी|
मैंनें चुपके से अपनी दाईं बाजु प्रियंका के बिस्तर पर तकिये से ज़रा सी नीचे दूर तक फैला दी|
प्रियंका चादर ऊपर खींच कर जैसे ही अपनें बिस्तर पर लेटी! मेरी बाजु उसकी गर्दन के नीचे से उसके परले कंधे तक पहुँच गई| उसनें
अपनें हाथ से अपनें दाएं कंधे के पास टटोल कर देखा तो मेरा दायां हाथ उसके हाथ में आ गया|
जैसे ही प्रियंका के हाथ की उंगलियां मेरे हाथ से टच हुई! मैंनें उस का हाथ जोर से पकड़ लिया|
पहले तो प्रियंका नें दो-चार पल अपना हाथ छुड़ानें की कोशिश की लेकिन जल्दी ही मेरा हाथ कस के पकड़ लिया|
मुझे तो दो जहान् की खुशियां मिल गई जैसे… मानो सारी कायनात ठहर गई हो!
मेरा दिल मेरे सीनें में धाड़-धाड़ बज़ रहा था और मैं अपनें ही दिल की धड़कन बड़ी साफ़-साफ़ सुन रहा था| पता नहीं ऐसे दो मिनट
बीते के दो घंटे… कुछ याद नहीं

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