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आख़िर चोद ही डाला मेरे ससुर जी नेंं मुझे -2

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किताब छुपा कर मेनें कहा : हाँ, कहानियाँ की किताब है रात आप से कहूँगी|ख़ुश हो कर वो चला गया| कितना भोला था ? उस की जगह दूसरा होता तो मुज़े छेड़े बैना नहीं जाता| दो दिन दरमियान मेनें देखा की लोग प्रदीप की हाँसी उड़ा रहे थे| कोई कोई भाभी कहती : देवर्जी, देवरानी ले आए हो तो उन से क्या करोगे ? उन के दोस्त कहते थे : भाभी गरम हो जाय और तेरी समाज में ना आय तब मुज़े बुला लेना| एक नें तो सीधा पूछा : प्रदीप, चूत कहाँ होती है वो पता है ? मुज़े उन लोगों की मज़ाक पसंद ना आई| अब में मेरे ससुरजी के दिल का दर्द समाज सकी| मुज़े उन दोनो पैर तरस भी आया| मैनें निर्धार किया की मैं बाज़ी अपनें हाथ ले लूंगी और सब की ज़ुबान बंद करवा दूँगी, चाहे मुज़े जो कुछ भी करना पड़ेतीसरी रात सुहाग रात थी| मेरी उमर की दो काज़ीन ननदो नें मुझे सजाया सँवारा और शयन कमरे में छोड़ दिया| दुसरी एक चाची प्रदीप को ले आई और दरवाज़ा बंद कर के चली गयी में घुमटा तान कर पलंग पर बैठी थी| घुँघट हटानें के बदले प्रदीप नें नीचे झुक कर झाँखनें लगा| वो बोला : देख लिया, मैनें देख लिया| तुम को मैनें देख लिया| चलो अब मेरी बारी, मे छुप जाता हूँ तुम मुझे ढूँढ निकालो|छोटे बच्चे की तरह वो चुपा छुपी का खेल खेलना चाहता था| मुझे लगा की मुझे ही लीड लेनी पड़ेगी| घुँघट हटा कर मेनें पूछा : पहले ये बताओ की मैं तुम्हे पसंद हूँ या नहीं| प्रदीप शरमा कर बोला : बहुत पसंद हो| मुहे कहानियाँ सुनाएगी ना ? में : ज़रूर सुना उंगी| लेकिन थोड़ी देर मुझ से बातें करो| प्रदीप : कौन सी कहानी सुनाएगी ? वो किताब वाली जो तुम पढ़ रही थी वो? में : हाँ, अब ये बताओ की में तुमारी कौन हूँ प्रदीप : वाह, इतना नहीं जानती हो ? तू मेरी पत्नी हो और में तेरा पतिमें : पति पत्नी आपस में मिल कर क्या करते हें ? प्रदीप : में जनता हूँ लेकिन बता उंगा नहीं| में :क्यूं ? प्रदीप : वो जो सुलेमान है ना ?

कहता है की पति पत्नी गंदा करते हें| मैनें पूछा नहीं की सुलेमान कौन था, मैं बोली : गंदा माइनें क्या ? नाम तो कहो, में भी जानू तो प्रदीप : चोदते हें| लंबा मुँह कर के में बोली : अच्छा ? बीन बोले उस नें सिर हिला कर हा कही| गंभीर मुँह से फिर मेनें पूछा : लेकिन ये चोदना क्या होता है ? प्रदीप : सुलेमान नें कभी मुज़े ये नहीं बताया| शरमा नें का दिखावा कर के मेनें कहा : में जानती हूँ कहूँ ? प्रदीप : हाँ, हाँ| कहो तोउस रात प्रदीप नें बताया की कभी कभी उस का लंड खड़ा होता था| कभी कभी स्वप्न दोष भी होता था| रसिकलाल सच कहते थे, उन्हों नें प्रदीप का खड़ा लंड देखा होगा| मेनें आगे बातें चलाई : ये कहो, मुझ में सब से अच्छा क्या लगता है तुम्हे ? मेरा चहेरा ? मेरे हाथ ? मेरे पाँव ? मेरे ये||? मेनें उन का हाथ पकड़ कर स्तन पर रख दिया| प्रदीप : कहूँ ? तेरे गाल| में : मुझे पप्पी दोगे ?प्रदीप : क्यूं नहीं ? उस नें मेरे गाल पैर किस की| मेनें उस के गाल पैर की| उनके लिए ये खेल था| मैनें जैसा मुँह से मुँह लगाया की उस नें झटके से छुड़ा लिया और बोला : छी छी, ऐसा गंदा क्यूं करती हो ? में : गंदा सही, तुम्हे मीठा नहीं लगता ? प्रदीप : फिर से करो तो| मैनें फिर मुँह से मुँह लगा कर किस किया|प्रदीप : अच्छा लगता है करो ना ऐसी पप्पी| मैनें किस करनें दिया| मैनें मुँह खोल कर उस के होठ चाटे तब फिर वो ही सिलसिला दोहराया| मेनें पूछा : प्यारे, पप्पी करते करते तुम को ओर कुछ होता है ? प्रदीप शरमा कर कुछ बोला नहीं| मैनें पूछा : नीचे पिसब की जगह में कुछ होता है ना ?

प्रदीप : तुम को कैसे मालूम ? में : मैं स्कूल में पढ़ी हूँ इस लिए कहो,, उधर गुदगुदी होती है ना ? प्रदीप : किसी से कहना मतमें : नहीं कहूँगी| में तुमारी पत्नी जो हूँ प्रदीप : मेरी नुन्नी में गुदगुदी होती है और कड़ी हो जाती है में : मैं देख सकती हूँ ? प्रदीप : नहीं| अच्छे घर की लड़कियाँ लड़ाकों की नुन्नी नहीं देखा करती|मैं : में तो स्कूल में ऐसा पढ़ी हूँ की पति पत्नी बीच कोई सीक्रेट नहीं है पत्नी पति की नुन्नी देख सकती है और उन से खेल भी सकती है पति भी अपनी पत्नी की वो वो… भोस देख डकाता है तुम नें मेरी देखनी है ? प्रदीप : पिताजी जानेंं गे तो बड़ी पिटाई होगी| में : श्ह्ह्हह|| कौन कहेगा उन से ? हमारी ये गुप्त बात रहेगी, कोई नहीं जान पाएगा| प्रदीप : हाँ, हाँ| कोई नहीं जान पाएगा| में : खोलो तो तुमारा पाजामा| पाजामा खोलनें में मुझे मदद करनी पड़ी| निकर उतारी तब फ़ान फ़नाता हुआ उस का सात इंच का लंबा लंड निकल पड़ा| में ख़ुश हो गयी मैनें मुट्ठी में पकड़ लिया और कहा : जानते हो ? ये तुमारी नुन्नी नहीं है ये तो लंड है प्रदीप : तू बहुत गंदा बोलती हो| मैनें लंड पर मूट मारी और पूछा : कैसा लगता है ? लंड नें एक दो ठुमके लगाए| वो बोला : बहुत गुदगुदी होती है मैं : मेरी भोस देखनी नहीं है ?प्रदीप : हाँ, हाँ| मेरे वास्ते शरमा नें का ये वक़्त नहीं था|मैं पलंग पर चित लेट गयी घाघरी उठाई और पेंटी उतर दी| वो मेरी नंगी भोस देखता ही रह गया| बोला : में छू सकता हूँ ? मैं : क्यूं नहीं ? मेनें जो तुमारा लंड पकड़ रक्खा हैडरते डरते उस नें भोस के बड़े होठ छुए| मेरे कहनें पर चौड़े किए| भीतरी हिस्सा काम रस से गिला था| आश्चर्य से वो देखता ही रहा| मेऐन : देखा ? वो जो चूत है ना, वो इतनी गहरी होती है की सारा लंड अंदर समा जाय| प्रदीप : हो सकता है लेकिन चूत में लंड पेल नें की क्या ज़रूरत ? मैं : प्यारे, इसे ही चुदाई कहते हें| प्रदीप : ना, ना, तुम झूठ बोलती हो| मैं : में क्यूं झूठ बोलूं ? तुम तो मेरे प्यारे पति हो| मेनें अभी अपनी भोस दिखाया की नहीं ?प्रदीप : में नहीं मानता| मैं : क्या नहीं मानते ? प्रदीप : वो जो तुम कहती हो ना की लंड चूत में डाला जाता है मुझे वो किताब याद आ गयी मैनें कहा : ठहरो, में कुछ दिखाती हूँ किताब के पहले पन्नें पर रसिकलाल का नाम लिखा हुआ था| वो दिखा कर मेनें कहा :ये किताब पिताजी की है पिक्चर देख वो हेरान रह गया| मेनें कहा : देख लिया ना ? अब तसल्ली हुई की चुदाई में क्या होता है ? उन पैर कोई असर ना पड़ा| वो बोला : मुज़े पिसब लगी हैमें : जाइए पीसाब कर नें के बाद लंड पानी से धो लीजिए, वो पिसब कर आया| उस का लंड नर्म हो गया था|

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