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“असली चुदाई का मजा पापा ने दिया”-5

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अभी तक आपनें पढ़ा कि मैंनें अपनी बहु की झांटें शेव करके उसकी चूत को चिकनी कर दिया|

उसी दिन दोपहर के बारह बजे का टाइम होगा! बहू रानी किचन में लंच के लिए सब्जी काट रही थी! मैं वहीं चेयर पर बैठा मोबाइल से खेल रहा था| बहूरानी नें मैक्सी पहन रखी थी जिसमें से उसका पिछवाड़ा बड़े शानदार तरीके से उभरा हुआ नज़र आ रहा था| क्या मस्त गांड थी बहूरानी की… जिसे देख कर मन मचल गया|
मैं उठा और बहूरानी को पीछे से पकड़ कर अपनें से सटा लिया और गर्दन चूमनें लगा|

“काम करनें दो पापा जी! परेशान मत करो अभी!” बहूरानी ऐसे ही मना करती रही और मैं मनमानी करता रहा|
फिर उनकी मैक्सी नीचे से ऊपर तक उठा दी! सामनें हाथ ले जा कर दोनों मम्में दबोच लिए और गर्दन चूमते हुए मम्में सहलानें लगा! ब्रा ऊपर खिसका कर नंगे दूध मसलनें लगा! फिर दोनों अंगूरों को धीरे धीरे उमेठनें लगा|

“उफ्फ… अब मान भी जाइए ना प्लीज!” बोलते हुए बहूरानी मुझे दूर हटानें लगी लेकिन मैंनें एक हाथ उसकी पैंटी में डाल दिया और चिकनी चूत मुट्ठी में भर के उससे खेलनें लगा|

“बहू रानी! तुमनें अपनें बाल तो कटवा लिए पर नाई की फीस तो दी ही नहीं?”
“सब कुछ तो ले लिया मेरा और मनमानी अब भी कर रहे हो| अब और क्या फीस चाहिए मेरे नाई जी को?”

मैंनें बहु की पैंटी नीचे खिसका दी और अपना लंड गांड के छेद से अड़ा दिया- फीस तो मैं इसी छेद से वसूलूंगा आज!
“धत्त! वहाँ मैंनें कभी नहीं करवाया|”
“तो आज करवा के देखो| वहाँ भी बहुत मज़ा आता है बिल्कुल चूत की तरह!”
“नहीं बाबा वहाँ नहीं| बहुत मोटा है आपका! मैं वहाँ नहीं सह पाऊँगी|”
“अरे एक बार ट्राई तो कर! मज़ा नहीं आये तो मत करनें देना|”

“अच्छा! एक बार घुसानें के बाद आप क्या मान जाओगे?”
“सच में अदिति बेटा! बहुत दिनों से मन में था तेरी गांड मारनें का| आज मत रोक मुझे!”
“पर पापा जी मुझे बहुत बहुत डर लग रहा है वहाँ नहीं| आप तो आगे वाली में कर लो चाहो तो!”
“कुछ नहीं होता बेटा! तेरी मम्मी की भी तो लेता हूँ पीछे वाली!”
“अच्छा करो धीरे से! लेकिन निकाल लेना जल्दी से अगर मैं कहूँ तो!”
“ठीक है तू चिंता मत कर अब|”

मैंनें पास रखे सब्जी फ्राई करनें वाले तेल से लंड को अच्छे से चुपड़ लिया और बहूरानी के दोनों हाथ सामनें स्लैब पर गैस के चूल्हे के पास रख दिए और उसे झुका कर कमर पकड़ कर पीछे की तरफ खींच ली जिससे उसका पिछवाड़ा अच्छी पोजीशन में मेरे लंड के सामनें आ गया|

इसी स्थिति में मैंनें बहूरानी की चूत में लंड पेल दिया और दस बारह धक्के लगा कर बहूरानी को तैयार किया| फिर मैंनें बहूरानी की दोनों टांगों को दायें बाएं फैला के लंड को उसके गांड के छेद से सटा दिया और उसके कूल्हों पर चपत लगानें लगा! पहले इस वाले पे! फिर उस वाले पे|

“अदिति बेटा! जरा अपनी गांड को अन्दर की तरफ सिकोड़ो और फिर ढीली छोड़ दो|”
“कोशिश करती हूँ पापा|” बहूरानी बोली और अपनी गांड को सिकोड़ लिया| उसकी गांड के झुर्रीदार छेद में हलचल सी हुई और उसका छेद सिकुड़ गया|
“गुड वर्क! बेटा| ऐसे ही करो तीन चार बार!”

मेरे कहनें पर बहूरानी नें अपनी गांड को तीन चार बार सिकोड़ के ढीला किया|
“बेटा! अब बिलकुल रिलैक्स हो जाओ| गहरी सांस लो और गांड को एकदम ढीला छोड़ दो|”
बहू रानी नें बिल्कुल वैसा ही किया|

“अदिति बेटा! गेट रेडी! मैं आ रहा हूँ|” मैंनें कहा| और लंड से उसकी गांड पर तीन चार बार थपकी दी|
“पापा जी आराम से”
“आराम से ही जाएगा बेटा! बस तू ऐसे ही रहना; एकदम रिलैक्स फील करना|”

गांड के छेद का छल्ला थोड़ा सख्त होता है| लंड एक बार उसके पार हो जाए फिर तो कोई प्रॉब्लम नहीं आती| अतः मैंनें अपनी फोरस्किन को कई बार आगे पीछे करके सुपाड़े को तेल से और चिकना किया और बहूरानी की गांड पर रख कर उनकी कमर कस के पकड़ ली और लंड को ताकत से धकेल दिया गांड के भीतर|

लंड का टोपा पहले ही प्रयास में गप्प से बहूरानी की गांड में समा गया| उधर बहूरानी जलबिन मछली की तरह छटपटाई- उई मम्मी रे… बहुत दर्द हो रहा है! पापा… फाड़ ही डाली आपनें तो; हाय राम मर गयी! हे भगवान् बचा लो आज!
बहूरानी ऐसे ही आर्तनाद करनें लगी|

ऐसे अनुभव मुझे पहले भी अपनी धर्मपत्नी के साथ हो चुके थे! वो भी ऐसी ही रोई थी और रो रो कर आसमान सिर पर उठा लिया था! बाद में जब मज़ा आनें लगा था तो अपनी गांड हिला हिला के लंड का भरपूर मज़ा लिया था और आज भी लेती है|

मैं जानता था कि बस एक दो मिनट की बात थी और बहूरानी भी अभी लाइन पर आ जायेगी| अतः मैं बहूरानी की चीत्कार! रोनें धोनें को अनसुना करके यूं ही स्थिर रहा और उसकी पीठ चूमते हुए नीचे हाथ डाल कर उसके बूब्स की घुन्डियाँ मसलता रहा और उसे प्यार से सांत्वना देता रहा|
उधर बहूरानी चूल्हे पर अपना सिर रख के सुबक सुबक के रोती रही|

कुछ ही मिनटों बाद मुझे अनुभव हुआ कि मेरे लंड पर गांड का कसाव कुछ ढीला पड़ गया साथ ही बहूरानी भी कुछ रिलैक्स लगनें लगीं थी| हालांकि रोते रोते उसकी हिचकी बंध गई थी|
“अदिति बेटा! अब कैसा लग रहा है?” मैंनें लंड को गांड में धीरे से आगे पीछे करते हुए पूछा|
“पहले से कुछ ठीक है पापा! लेकिन दर्द अब भी हो रही है|”
“बस थोड़ी सी और हिम्मत रखो बेटा! दर्द अभी ख़त्म हो जाएगा फिर तुझे एक नया मज़ा मिलेगा|”

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मैं लंड को यूं ही उसकी गांड में फंसाए हुए उसके हिप्स सहलाता और मसलता रहा; बीच बीच में पीठ को चूम कर मम्में दबाता रहा| कुछ ही मिनटों में बहू रानी नार्मल लगनें लगी! लंड पर उसकी गांड की जकड़ कुछ ढीली पड़ गई और उसकी कमर स्वतः ही लंड लीलनें का प्रयास करते हुए आगे पीछे होनें लगी|

“पापा जी! नाउ इट्स फीलिंग गुड| जल्दी जल्दी करो अब!” बहूरानी नें अपनी गांड उचका के दायें बाएं हिलाई|
“आ गई ना लाइन पे! बहुत चिल्ला चिल्ला के रो रो के दिखा रही थी अभी!” मैंनें बहूरानी के कूल्हों पर चांटे मारते हुए कहा|
“अब मुझे क्या पता था कि पीछे वाली भी दर्द के बाद इतना ढेर सारा मज़ा देती है|”
“तो ले बेटा! अपनी गांड में अपनें ससुर के लंड का मज़ा ले|” मैंनें कहा और लंड को थोडा पीछे ले कर पूरे दम से पेल दिया बहूरानी की गांड में|

“लाओ! दो पापा जी|| ये लो अपनी बहूरानी की गांड!” अदिति बोली और अपनी गांड को मेरे लंड से लड़ानें लगी|
“शाबाश बेटा! ऐसे ही करती रह|” मैंनें बहू रानी की पतली कमर दोनों हाथों से कसके पकड़ के उसकी गांड में लंड से कसकर ठोकर लगाई! साथ में नीचे उसकी चूत में अपनी बीच वाली उंगली घुसा के अन्दर बाहर करनें लगा|

“आह…पापा जी! आज तो गजब कर रहे हो आज! मेरा मन जोर जोर से चिल्ला चिल्ला के चुदनें का कर रहा है|”
“तो चिल्ला जोर से!” मैं उसकी चूत के दानें को मसलते हुए बोला|
“पापा आ… तीन उंगलियां घुसेड़ दो मेरी चूत में और धक्के लगाओ जोर जोर से!”
“ये लो अदिति बेटा… ऐसे ही ना?” मैंनें हाथ का अंगूठा और छोटी अंगुली मोड़ कर तीनों उंगलियाँ बहूरानी की बुर में घुसा दीं और उसकी गांड में धक्के पे धक्के देनें लगा|

बहूरानी की चूत रस बरसा रही थी| मेरी सारी उंगलियां और हथेली उसके चूत रस से सराबोर हो गयी|
“और तेज पापा और तेज… अंगुलियां और भीतर तक घुसा दो चूत में पापा!” बहूरानी मिसमिसा कर बोली|

अबकी मैंनें अपनी चारों उंगलियां उसकी चूत में जितना संभव था उतनी गहराई तक घुसा के उसकी गांड ठोकनें लगा|
“आह… यू आर ग्रेट पापा; फक मी लाइक अ बिच… टिअर माय बोथ होल्स… फाड़ के रख दो मेरी गांड को और उंगलियां गहराई तक घुसा दो मेरी चूत में और चोदो मेरी गांड को!” बहूरानी अब अपनें पे आ चुकी थी और मज़े के मारे बहकी बहकी बातें करनें लगी थी|

मैं जानता था कि औरत जब पूरी हीट पर आ जाये तो उसे बड़े ही एहितयात से टेक्टफुल्ली संभालना होता है; इसी पॉइंट पर पुरुष की सम्भोग कला और धैर्य का इम्तिहान होता है|
“हाँ अदिति बेटा ये ले!” मैंनें कहा और उसकी चोटी अपनें हाथ में लपेट के खींच ली जिससे उसका मुंह ऊपर उठ गया और अपनें धक्कों की स्पीड कम करके लंड को धीरे धीरे उसकी गांड में अन्दर बाहर करनें लगा|

“पापा जी! लंड को चूत में दीजिये न कुछ देर प्लीज!”
“ये लो बेटा!” मैंनें कहा और लंड को गांड से निकाल कर फचाक से बहूरानी की चूत में पहना दिया और चोदनें लगा|
“वाओ पापा… चोदो तेज तेज चोदो… लंड के साथ अपनी दो अंगुलियां भी घुसा दो भीतर|” बहू रानी किसी हिस्टीरिया से पीड़ित की तरह बहकनें लगी|

अदिति की गांड का छेद मुंह बाए लंड के इंतज़ार में कंपकंपा सा रहा था लेकिन मैं एक अंगुल नीचे उसकी चूत को अपनें लंड से संभाले हुए था|

तभी मुझे एक आडिया आया| किचिन में सामनें प्लेटफॉर्म पर सब्जियां रखीं थी| मेरी नज़र कच्चे केलों के गुच्छे पर गयी जिसमें बड़े बड़े लम्बे मोटे साइज़ के हरे हरे कच्चे कड़क कठोर केले लगे थे| बहूरानी को कच्चे केलों की सब्जी बहुत पसंद है न|

“अदिति बेटा तुझे कच्चे केले की सब्जी बहुत अच्छी लगती है ना?” मैंनें उसकी चूत को लंड से धकियाते हुए पूछा|
“हाँ! पापा जी| कल बनाऊँगी आप भी खाना| मस्त लगती है मुझे तो!” बहूरानी नें अपनी कमर पीछे ला के लंड लीलते हुए कहा|
“तो बेटा! आज तेरी चूत को कच्चे केलों का स्वाद चखाता हूँ मैं!” मैंनें कहा और केलों के गुच्छों में से दो बड़े वाले जुड़े हुये केले तोड़ लिए और अपनें लंड को उसकी चूत से बाहर निकाल के एक सबसे बड़ा वाला केले पर तेल चुपड़ के बहूरानी की चूत में कोशिश करके पूरा घुसा दिया! दूसरा केला नीचे लटक के झूलनें लगा; इसी स्थिति में मैं लंड को फिर से अदिति की गांड में घुसानें लगा| नीचे चूत में केला फंसे होनें के कारण लंड को केले की रगड़ महसूस हो रही थी और वो अटकता हुआ सा गांड में घुस रहा था| मैंनें धीरे धीरे करके लंड को आगे पीछे करते हुए आखिर पूरा लंड बहूरानी की गांड में जड़ तक पहना दिया| और उसकी कमर पकड़ कर गांड मारनें लगा|

लंड के धक्कों से नीचे लटकता हुआ केला जोर जोर से झूलनें लगता साथ में चूत में फंसे हुए केले में भी कम्पन होनें लगते इस तरह बहूरानी की चूत और गांड दोनों छेदों में जबरदस्त हलचल मचनें लगी| मैं पूरी ताकत और स्पीड से दांत भींच कर लंड चलाता रहा|

गांड मारनें का अपना अलग ही मज़ा है कारण की गांड के छल्ले में लंड फंसता हुआ अन्दर बाहर होता है जिससे दोनों को अविस्मरणीय सुख की अनुभूति होती है| चूत तो चुदते चुदते सभी की ढीली ढाली हो ही जाती है और फिर चुदाई के टाइम इतना पानी छोड़ती है कि लंड को बीच में रोक के पौंछना ही पड़ता है; जबकि गांड हमेशा एक सा मज़ा देती रहती है|

“पापा जी… बहुत थ्रिलिंग महसूस हो रहा है चूत में| ऐसा मज़ा तो पहले कभी भी नहीं आया मुझे!” बहूरानी बोली और अपना हाथ पीछे ला कर केले को चूत में और भीतर तक घुसा लिया और अपनी गांड पीछे की तरफ करके धक्कों का मजा लेनें लगी और बहुत जल्दी झड़नें पे आ गयी|
“आह||मैं तो आ गयी पापा” बहूरानी बोली और खड़ी हो गई और अपनी पीठ मेरे सीनें से चिपका के अपनी बांहें पीछे लाकर मेरे गले में डाल के मुझे लिपटा लिया| उत्तेजना के मारे बहूरानी का जिस्म थरथरा रहा था|

मेरा लंड अभी भी उसकी गांड में फंसा हुआ था| मैं भी झड़नें के करीब ही था! मैंनें बहू रानी के दोनों मम्में मुट्ठियों में दबोच लिए और जल्दी जल्दी धक्के मारनें लगा जिससे चूत में घुसा हुआ केला धक्कों से नीचे गिर गया साथ में मैं झड़नें लगा और मेरे लंड से रस की फुहारें निकल निकल के उसकी गांड में समानें लगीं|

“पापा जी मुझे नीचे लिटा दो अब अब खड़ा नहीं रहा जाता मुझसे!” बहूरानी कमजोर स्वर में बोली|
मैंनें उसे पकड़े हुए ही धीरे से फर्श पर लिटा दिया और और खुद उसके बगल में लेट कर हाँफनें लगा|

“पापा! आज तो गजब का मज़ा आया पहली बार!” बहूरानी प्यार से मेरी आंखों में देखती हुई बोली और मेरे सीनें पर हाथ फिरानें लगी|
मैंनें भी उसे चूम लिया और अपनें से लिपटा लिया| बहुत देर तक हम दोनों ससुर बहू यूं ही चिपके पड़े रहे|

“छोड़ो पापा जी! लंच भी तो बनाना है अभी!” बहूरानी बोली और उठ के खड़ी होनें लगी और जैसे तैसे खड़ी होकर प्लेटफोर्म का सहारा ले लिया और धीरे धीरे बाथरूम की तरफ चल दी|
मैंनें नोट किया कि बहूरानी की चाल बदली बदली सी लगनें लगी थी|

जिस दिन दोपहर की यह घटना है उस दिन रात को और अगले दिन बहूरानी नें मुझे कुछ भी नहीं करनें दिया; कहनें लगी कि उसकी गांड बहुत दर्द कर रही है और उसे चलनें फिरनें में भी परेशानी हो रही है| अतः मैंनें भी ज्यादा कुछ नहीं कहा और ये दो दिन बिना कुछ किये ऐसे ही निकल गए|

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