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“असली चुदाई का मजा पापा ने दिया”-1

अन्तर्वासना के सभी पाठक पाठिकाओं को मेरा सप्रेम नमस्कार!
प्रस्तुत कहानी मेरी पिछली कहानियों

की अगली और अंतिम कड़ी है| तो इस रसभरी सत्य कथा का मज़ा लीजिये और पढ़ते पढ़ते जैसे चाहें मज़ा लीजिये पर मुझे अपनें कमेंट्स नीचे लिखी मेल आई डी पर जरूर लिखिए| आपके कमेंट्स ही तो हम लेखकों का पारश्रमिक है और प्रोत्साहन भी|

पहले मैं पहले की कहानी संक्षेप में दुहरा देता हूँ|
मेरी इकलौती बेटी की शादी और विदाई हो चुकी थी! घर मेहमानों से भरा हुआ था| मैं पिछले पंद्रह दिनों से दिन रात एक किये हुए था! न ठीक से सोना न खाना|

बेटी की विदाई का दूसरा दिन था! कई मेहमान जा चुके थे! अभी भी घर मेहमानों से भरा हुआ था| मैं रात में सोनें की जगह तलाश कर रहा था पर सब जगह भरी हुई थीं|
फिर मुझे ऊपर छत पर बनी कोठरी का ध्यान आया! मैं गद्दों के ढेर में से बिस्तर लेकर ऊपर वाली कोठरी में पहुंच गया सोनें के लिए| वहां का बल्ब फ्यूज हो चुका था अतः अंधेरे में ही वहां पड़े सामान को खिसका कर मैंनें अपनें सोनें लायक जगह बनाई और लेटते ही मुझे मुठ मारनें की इच्छा होनें लगी क्योंकि पिछले महीनें भर से बीवी की चूत नसीब नहीं हुई थी| अतः मैं पूरा नंगा होकर मूठ मारनें लगा|

तभी अचानक कोई साया कोठरी में घुसता है और अपनें पूरे कपड़े उतार कर मुझसे नंगा होकर लिपट जाता है| उसकी आवाज से मैं पहचानता हूं कि वो मेरी इकलौती बहूरानी अदिति थी जो मुझे अपना पति समझ के सम्भोग करनें के लिए उकसाती है! मुझसे लिपटती है! मेरा लंड चूसनें लगती है| मैं खुद को बचानें की बहुत कोशिश करता हूं पर मेरी कामना भी जाग जाती है और मैं अपनी बहूरानी को चोद डालता हूं| अभी तक बहूरानी को पता नहीं रहता कि मैं! ससुर उसे चोद रहा है| सुबह होते ही मैं निकल लेता हूं|

बाद में बहूरानी को पता चलता है कि वो पिछली रात किसी और से ही चुद गयी थी तो वो टेंशन में आ जाती है कि इतनें सारे मेहमानों में वो पता नहीं किससे चूत मरवा बैठी| उसकी चिंता मुझसे देखी नहीं जाती और उसे मैं बता देता हूं कि पिछली रात मैं ही ऊपर कोठरी में उसके साथ था| इसके बाद हम ससुर बहू के सेक्स सम्बन्ध बन जाते हैं और मैं उसे कई बार और चोदता हूं|
फिर बहूरानी मेरे बेटे के साथ चली जाती है जहां वो नौकरी करता था|

इन सब बातों के बाद कई महीनें यूं ही गुजर गए| मैं भी अदिति के साथ अपनें उस रिश्ते को भुलानें की कोशिश करता रहा और समय के साथ धीरे धीरे वो सब बातें भूलती चली गईं| ज़िन्दगी फिर से पुरानी स्टाइल में चलनें लगी|
अदिति बहूरानी का फोन हर दूसरे तीसरे दिन मेरी धर्मपत्नी के फोन पर आता ही रहता था| वो लोग ज्यादातर घर गृहस्थी और रसोई से सम्बंधित बातें ही करती थीं|

‘मम्मी! आज इनको पालक छोले की सब्जी खानी है जैसी आप बनाती हो! आप मुझे गाइड करो कैसे बनाना है’; ‘मम्मी आम का अचार डालना है आज! आप बता दो कैसे क्या क्या करते हैं’ इत्यादि इत्यादि| सास बहू की ऐसी ही घरेलू बातें होती रहतीं फोन पर|
हां अदिति मेरे बारे में अपनी सास से जरूर पूछ लेती हर बार कि पापा जी कैसे हैं| लेकिन बहूरानी नें मेरे फोन पर कभी भी फोन नहीं किया और न ही मैंनें उसके फोन पर कभी किया| कभी कोई जरूरी बात होती भी तो अपनें बेटे के फोन पर बात कर लेता था|

मैं बहूरानी के इस तरह के व्यवहार से बेहद संतुष्ट था| मुझसे कई बार अपनी चूत चुदवानें के बाद भी वो मेरे साथ बिल्कुल नार्मल बिहेव कर रही थी जैसे कि हम दोनों के बीच कुछ ऐसा वैसा हुआ ही न हो या वो मुझसे चुदवानें के पहले किया करती थी|

दिन यूं ही गुजर रहे थे| हालांकि मुझे अदिति बहूरानी के साथ बिताये वो अन्तरंग पल याद आते तो मन में फिर से उसकी चूत चाटनें और चोदनें की इच्छा बलवती हो उठती; उसके मादक हुस्न और भरपूर जवां नंगे जिस्म को भोगनें की छटपटाहट और उसकी चूत में समा जानें की ललक मुझे बेचैन करनें लगती| लेकिन मैं ऐसी कामुक कुत्सित इच्छाओं को बलपूर्वक मन में ही दबा देता था| आखिर वो मेरी बहूरानी! मेरे घर की लाज थी|

हालांकि उसके साथ इन अनैतिक रिश्तों की शुरुआत उसी की तरफ से अनजानें में ही हुई थी फिर बाद में वो और मैं दोनों चुदाई के इस सनातन खेल में लिप्त हो गए थे|

बहू रानी मेरे लम्बे मोटे दीर्घाकार लंड की दीवानी हो चुकी थी तो मैं भी उसकी कसी हुई चूत का दास हो चुका था| उसके यहां से जानें के बाद वो पागलपन! वो चाहतें धीरे धीरे स्वतः ही कमजोर पड़नें लगीं| अच्छा ही था एक तरह से| ऐसे अनैतिक रिश्ते भले ही कितना मज़ा दें लेकिन एक बार बात खुलनें के बाद ज़िन्दगी में हमेशा के लिए जहर घोल जाते हैं; जीवन नर्क बन जाता है और इंसान खुद की और अपनों की नज़र में हमेशा के लिए गिर जाता है| कई लोग तो आत्महत्या तक कर डालते हैं|

समय गुजरनें के साथ मैंनें खुद पर काबू पाना सीख लिया और वो सब बातें मैंनें सदा सदा के लिए दिमाग से निकाल दीं|
लेकिन होनी को कोई नहीं टाल सकता; कोई कितनी भी चतुराई दिखा ले लेकिन होनी के आगे उसकी एक नहीं चलती|

एक दिन की बात है सुबह का टाइम था कोई आठ बजनें वाले होंगे कि वाइफ के फोन की घंटी बजी| पत्नी किचन से चाय लेकर आ ही रही थी| उसनें चाय टेबल पर रखी और फोन ले लिया|
“अदिति का फोन है|” वो मुझसे बोली|
“हां! अदिति कैसी है तू?”

जवाब में अदिति नें भी कुछ कहा|

“बहूरानी! मैं कैसे आ सकती हूं| तू तो जानती है घर संभालना इनके बस का नहीं| दूध वाला! सब्जी वाला! धोबी ये वो पचास झंझट होते हैं गृहस्थी में| और तू अपनी कामवाली को तो जानती ही है कितनी मक्कार है काम करनें में! उसके सिर पर खड़े होकर काम करवाओ तभी करती है; अगर मैं तेरे पास आ गई तो समझ लो घर का क्या हाल करेगी वो और सबसे बड़ी बात तू तो जानती ही
है मेरे घुटनें का दर्द; स्टेशन की भीड़ भाड़ में पुल चढ़ना उतरना मेरे बस का अब नहीं रह गया| हफ्ते दस दिन की ही तो बात है तू ही आ जा न यहां पर!” पत्नी बोली|

जवाब में अदिति नें क्या कहा मुझे नहीं पता|

“अच्छा ठीक है बहू! जमाना खराब है| मैं इनसे बात करके इन्हें कल भेज दूंगी! तू चिंता मत करना|”
कुछ देर सास बहू में और बातें हुईं और फोन कट गए|

“सुनो जी! आपके लाड़ले को कंपनी वाले दस दिन की ट्रेनिंग पर बंगलौर भेज रहे हैं| अदिति मुझे बुला रही थी वहां रहनें के लिए| मैं तो जा नहीं पाऊँगी! आप ही चले जाओ बहू के पास कल शाम की ट्रेन से| वहां वो अकेली कैसे रहेगी| आप तो जानते हो ज़माना कितना ख़राब है आजकल!”
“अरे तो अदिति को यहीं बुला लो ना| गुड़िया की शादी के बाद से आई भी नहीं है वो!” मैंनें कहा|

“मैंनें तो कहा था उससे आनें के लिए पर वो कह रही है कि अगले महीनें उसका कोई एग्जाम है बैंक में पी ओ| का वो उसकी तैयारी कर रही है| अब उसके भी करियर की बात है| आप ही चले जाओ कल!” पत्नी नें कहा|
“ठीक है| मैं कल शाम को चला जाऊंगा|” मैंनें संक्षिप्त सा जवाब दिया और चाय पीनें लगा|

मेरे हां कहनें के बाद पत्नी जी नें अदिति बहूरानी को तुरंत फोन मिलाया| फोन कनेंक्ट होते ही- हां अदिति बेटा सुन! मैंनें इनसे कह दिया है तेरे यहां जानें के लिए| ये कल शाम की ट्रेन से बैठ जायेंगे; और सुन मैं इनके साथ तेरे लिए दही बड़े भी भेज रही हूं इमली की चटनी के साथ! तेरे को बहुत पसंद हैं ना!
पत्नी जी के इतना कहते ही बहूरानी की हंसी की धीमी खनक मेरे कानों में पड़ी| सास बहू की कुछ और बातें हुईं और फोन कट गया|

“आप चाय पियो मैं जाती हूं अब| उड़द की दाल भिगो देती हूं| कल दही बड़े बना दूंगी आप ले जाना!” पत्नी जी मुझसे बोलीं और चली गयीं|

“मैं और अदिति बहूरानी अकेले एक ही घर में! और तीसरा कोई नहीं; वो भी पूरे दस दिन और दस रातें!” ऐसा सोचते हुए मेरे दिल की धड़कन असामान्य रूप से बढ़ गई| ये तो मैंनें कभी सोचा ही नहीं था कभी ये दिन भी हमारे जीवन में आयेंगे जब मैं और बहूरानी यूं अकेले रहेंगे एक ही घर में; जो बातें मैंनें अपनें दिलो दिमाग से बिल्कुल निकाल दीं थीं लेकिन वक़्त के एक पल नें सब कुछ बदल कर रख दिया था जैसे|

जब मैं और बहूरानी घर में अकेले होंगे तीसरा कोई नहीं होगा तो क्या मैं या वो अपनें पर काबू रख सकेंगे?
शायद नहीं|
इतिहास खुद को पुनः दोहरानें वाला था जल्दी ही|

अदिति के साथ की गई पिछली चुदाईयां फिर से सजीव हो उठीं| एक एक बात याद आनें लगी| वो छत के ऊपर वाले अँधेरे कमरे में अदिति के साथ पहली चुदाई जिसमें उसे नहीं पता था कि वो अपनें ससुर से चुदवा रही है! फिर बाद की चुदाई के नज़ारे मेरे दिमाग में से गुजरनें लगे| कितनें प्यार से लंड चूसती है मेरी बहूरानी और कितनें समर्पित भाव से अपनी चूत मुझे देती है! जैसे
कोई अनुष्ठान! कोई यज्ञ हो| अब तो वो चूत लंड चुदाई जैसे शब्द भी खूब बोलती है चुदते टाइम|

ये सब पिछली बातें सोच सोच के मेरे लंड में फिर से जोश भरनें लगा|

अब जब अदिति को तो पता चल ही चुका है कि मैं उसके पास परसों सुबह पहुंच जाऊंगा; तो क्या वो भी अभी मेरी ही तरह ही सोच रही होगी इस टाइम! क्या उसकी चूत भी मेरे लंड की याद में रसीली हो उठी होगी और उसकी पैंटी गीली हो गई होगी?

पर इन सवालों का फिलहाल मेरे पास कोई जवाब नहीं था|

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तो अगले दिन शाम तक पत्नी जी नें मेरे जानें की तैयारियां कर दीं| दही बड़े! चटनी! आम नींबू के अचार! मूंग की दाल की बड़ी! पापड़ ये सब अच्छी तरह से पैक करके मुझे दे दिया| कुल मिलाकर कोई पांच सात किलो वजन तो हो ही गया था| मैंनें अपनी तरफ से भी पूरी तैयारी कर ली थी; वैसे मुझे तैयारी करनी भी क्या थी| सिर्फ अपनी झांटें शेव करनी थी सो अपनें लंड को बढ़िया चिकना कर लिया ताकि बहूरानी को मेरा लंड चूसनें में! अगर वो चाहेगी! तो कोई परेशानी! कोई असुविधा न हो|

तो मित्रो मैंनें जानें के लिए तत्काल में अपना आरक्षण सुबह ही करा लिया था| ऐ| सी| सेकेण्ड में कोई जगह नहीं मिली 18 वेटिंग आ रही थी! आप सबको तो पता ही है कि ऐ|सी| की वेटिंग बहुत कम कन्फर्म होती है| अगर ऐ|सी| टू के कई कोच लगे हों तो शायद हो भी जाय| पर मेरी वाली ट्रेन में ऐ|सी|टू का सिर्फ एक ही कोच लगता था| तो 18 वेटिंग कन्फर्म होनें का सवाल ही नहीं था|

लेकिन सौभाग्य से ऐ|सी| थर्ड में तीन बर्थ उबलब्ध थीं मैंनें फुर्ती से अप्लाई किया तो मेरी बर्थ कन्फर्म हो गई| हालांकि मुझे मिडल बर्थ मिली जो मुझे अच्छी नहीं लगती लेकिन अदिति बहूरानी से पुनर्मिलन में इन छोटी मोटी परेशानियों से कोई फर्क नहीं! अगर जनरल क्लास में भी जाना पड़ता तब भी मैं एक पैर पर खड़े होकर जानें को तैयार था|

मिडल और अपर बर्थ का एक फायदा भी होता है| आप नीचे बैठी लड़कियों या महिलाओं की क्लीवेज और मम्में बड़े आराम से तक सकते हैं निहार सकते हैं| आजकल की लेडीज दुपट्टा तो डालती नहीं! ऊपर से ब्रा भी स्टाइलिश पहनती हैं जिसमें उनके मम्मों का आकार प्रकार अत्यंत लुभावना होकर उभरता है! अपर बर्थ्स का ये सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है कि आप चाहो तो आराम से किसी हसीना के मस्त मस्त मम्मों का दीदार करते हुए आराम से चादर के नीचे लंड को हिला हिला के मुठ मार सकते हो कोई देखनें वाला टोकनें वाला नहीं|
नीचे बैठी हसीना को आप अपनें ख्यालों में लाकर तरह तरह से चोदते हुए मूठ मार सकते हो|

तो उस दिन ट्रेन निर्धारित समय से बीस बाईस मिनट देरी से आई| मेरी वाली बर्थ के नीचे वाली लोअर बर्थ पर एक चौबीस पच्चीस साल की आकर्षक नयन नक्श वाली खूबसूरत महिला थी उसनें ब्लैक टॉप और जीन्स पहन रखा था| वो एक हाथ में सिक्स इंच वाला स्मार्ट फोन लिये नेंट सर्फ़ कर रही थी! दूसरे हाथ से एक अंग्रेजी पत्रिका के पन्नें भी पलटे जा रही थी| ट्रेन की खिड़की की तरफ वाले प्लग में उसनें अपना लैपटॉप लगा रखा था|
ऐ|सी|कोच में ज्यादातर ऐसे ही नज़ारे देखनें को मिलते हैं| हर कोई अपनें आप को ख़ास और व्यस्त दिखलानें का प्रयास करता है|

सौभाग्य से नीचे वाली महिला! नहीं! उसे महिला कहना अनुचित होगा! लड़की के टॉप का गला कुछ ज्यादा ही बड़ा था जिससे उसके अधनंगे बूब्स के दर्शन मुझे बहुत पास से बड़ी अच्छी तरह से हो रहे थे! मतलब आँखें सेंकनें यानि चक्षु चोदन का पूरा पूरा इंतजाम था|

उसके सामनें वाली बर्थ पर एक ताजा ताजा जवान हुई छोरी थी जो किसी मोटी किताब के पन्नें पलट रही थी और एक नोटबुक में कुछ लिखती भी जा रही थी साथ में बार बार अपना मोबाइल भी चेक करती जाती! शायद उसका कल कोई एग्जाम था जिसकी तैयारी में थी|

यही सब देखते देखते मुझे नींद आनें लगी साथ ही पेशाब भी लग आई थी| मैं उठा और टॉयलेट में घुसा और जल्दी जल्दी निबटनें लगा| नज़र सामनें पड़ी तो दीवार पर जगह जगह चूत के चित्र बनें हुए थे साथ में कॉल गर्ल्स के फोन नम्बर शहर के नाम के साथ लिखे थे| हो सकता है ये असली कालगर्ल्स के नंबर हों या किसी नें किसी लड़की को परेशान करनें के लिए उसके असली नम्बर शहर के नाम के साथ लिख दिए हों|

कई चित्रों में चूत में लंड घुसा था और चूत की शान में कई शायरी भी लिखीं थीं| ऐसे अश्लील चित्र हमारी ट्रेन्स के लगभग हर टॉयलेट में मिल जाते हैं| पता नहीं किस तरह के लोग ये सब गन्दगी फैलाते हैं| महिलायें भी ये सब देखती पढ़ती होंगी| कुछ सिरफिरे लोग किसी लड़की से चिढ़ कर उसका नंबर इस तरह शहर के नाम के साथ लिख देते हैं फिर लोग उन्हें कॉलगर्ल समझ कर फोन करते हैं|
अंत में उस बेचारी लड़की को वो नम्बर हटाना ही पड़ता है|

टॉयलेट से वापिस आकर मैं सोनें की कोशिश करनें लगा| मेरा स्टेशन सुबह पांच बजे आना था तो मैं सुबह चार बजे ही उठ गया|

अदिति बहूरानी के घर पहुंचते पहुंचते साढ़े छः हो गए| मुझे पता था कि अदिति घर में अकेली ही होगी क्योंकि मेरे बेटा तो पिछली शाम को ही बंगलौर निकल लिया होगा| मैं टैक्सी से उतरा तो देखा बहूरानी जी ऊपर बालकनी में खड़ी हैं| मुझे देखते ही उसका चेहरा खिल गया|
“आई पापा जी!” वो बोली|
एक ही मिनट बाद वो मेरे सामनें थी| आते ही उसनें सिर पर पल्लू लेकर मेरे पैर छुए जैसे कि वो हमेशा करती थी| मैंनें भी हमेशा की तरह उसके सिर पर हाथ रखकर उसे आशीर्वाद दिया|

मेरी बहूरानी में ये विचित्र सी खासियत है| मुझसे इतनी बार चुदनें के बाद भी उसका व्यवहार कभी नहीं बदला| मेरा आदर! मान सम्मान वो पहले की ही तरह करती आ रही थी|
हां जब वो बिस्तर में मेरे साथ पूरी मादरजात नंगी मेरे आगोश में होती तो उसका व्यवहार किसी मदमस्त प्यासी! चुदासी कामिनी की तरह होता था| बहूरानी जी बेझिझक मेरी आँखों में आँखे डाल के मुस्कुरा मुस्कुरा के लंड चूसती फिर अपनी चूत में लंड लेकर लाज शर्म त्याग कर मेरी नज़र से नज़र मिलाते हुए उछल उछल कर लंड का मज़ा लेती और अपनी चूत का मज़ा लंड को देती और झड़ते ही मुझसे कस के लिपट जाती! अपनें हाथ पैरों से मुझे जकड़ लेती! अपनी चूत मेरे लंड पर चिपका देती और जैसे सशरीर ही मुझमें समा जानें का प्रयत्न करती|

चुदाई ख़त्म होते ही वो मेरा गाल चूम के “थैंक्यू पापा जी! यू आर सो लविंग” जरूर कहती और कपड़े पहन! सिर पर पल्लू डाल के संस्कारवान बहू की तरह लाज का आवरण ओढ़ बिल्कुल सामान्य बिहेव करनें लगती थी जैसे हमारे बीच कुछ ऐसा वैसा हो ही नहीं!
मैं चकित रहता था उसके ऐसे व्यवहार से|

अब आगे:

बहूरानी नें नीचे आकर मेरे हाथ से बैग और सामान का थैला ले लिया! “पापा जी! अन्दर चलिये” वो बोली|
मैं घर के अन्दर जानें लगा अदिति मेरे पीछे पीछे आ रही थी| बहूरानी का फ़्लैट सेकंड फ्लोर पर था| हम लोग लिफ्ट से एक मिनट से भी कम समय में दूसरी मंजिल पर पहुंच गए| मैं बहूरानी का घर देखनें लगा! दो बेडरूम हाल किचन का घर था| बड़े ही सुरुचिपूर्ण ढंग से घर को सजाया था मेरी बहू नें|

बाहर बालकनी थी जहां से सड़क और बाहर का दृश्य देखना अच्छा लगता था| मैं बालकनी में चेयर पर बैठ गया| बहूरानी पानी का गिलास लिए आई|
“पानी लीजिये पापा जी! मैं चाय बना के लाती हूं!” वो बोली और किचन में चली गई|

पानी पी कर मैं बाथरूम चला गया| बाथरूम अच्छा बड़ा सा था| एयर फ्रेशनर की मनभावन सुगंध से बाथरूम महक रहा था| बाथरूम में एक तरफ वाशिंग मशीन रखी थी जिस पर बहूरानी के कपड़े धुलनें के लिए रखे थे|
कपड़ों के ढेर के ऊपर ही उसकी तीन चार ब्रा और पैंटी पड़ी थीं| मैंनें एक ब्रा को उठा कर उसका कप मसला और दूसरे हाथ से पैंटी उठा कर सूंघनें लगा| बहूरानी की चूत की हल्की हल्की महक पैंटी से आ रही थी|
मैंनें पैंटी को मुंह से लगा के चूमा और फिर गहरी सांस भर कर बहूरानी की चूत की गंध मैंनें अपनें भीतर समा ली| फिर मैंनें पैंटी को अपनें लंड पर लपेट कर पेशाब की और पैंटी! ब्रा वापिस रख कर बाहर आ के बालकनी में बैठ गया|

कुछ ही देर बाद बहूरानी चाय और बिस्किट्स लेकर आईं और मेरे सामनें ही चेयर ले के बैठ गईं|
“लीजिये पापा जी!” वो बोली और चाय सिप करनें लगी| मैंनें भी एक बिस्किट ले के चाय ले ली और सिप करनें लगा|

अब मैंनें बहूरानी को गौर से निहारा| नहाई धोई अदिति उजली उजली सी लग रही थी| गहरे काही कलर की कॉटन की साड़ी और मैचिंग ब्लाउज में उसका सौन्दर्य खिल उठा था| गले में पहना हुआ मंगलसूत्र अपनी चमक बिखेरता हुआ उसके उरोजों के मध्य जाकर छुप गया था| गाजर की तरह सुर्ख लाल उसके होठों से रस जैसे छलकनें ही वाला था| मेरी बहूरानी लिपस्टिक कभी नहीं लगाती! ये मुझे पता था! उसके होठों का प्राकृतिक रंग ही इतना मनभावन है कि कोई लिपस्टिक उसका मुकाबला कर ही नहीं सकती|

‘इन्हीं होठों नें मेरे लंड को न जानें कितनी बार चूसा है! चूमा है मैंनें मन ही मन सोचा|
“हां! पापा जी| अब बताओ आपकी जर्नी कैसी रही| घर पर मम्मी जी कैसी हैं?” अदिति नें पूछा|
“सब ठीक है अदिति बेटा| तेरी मम्मी नें बहुत सारा सामान भेजा है देख ले उसमें दही बड़े भी हैं! कहीं ख़राब न हो जायें! उन्हें फ्रिज में रख देना|” मैंनें कहा|
“ठीक है पापा जी| अभी दही नमक मिलाकर रख दूंगी” वो बोली|

हमलोग काफी देर तक यूं ही बातें करते रहे| फिर वो मुझे नहानें का बोल कर नाश्ता बनानें चली गई|

नाश्ता! लंच सब हो गया| इस बीच मैंनें एक बात नोट की कि मैं जब भी उसकी तरफ देख कर बात करता वो आँखे चुरा लेती और कहीं और देखते हुए मेरी बात का जवाब देनें लगती|
पहले तो मैंनें इसे अपना वहम समझा लेकिन मैंनें बार बार इसे कन्फर्म किया|
बहूरानी जी ऐसे ही मेरी तरफ डायरेक्ट देखना अवॉयड कर रहीं थीं|

तो क्या सबकुछ ख़त्म हो गया? बहूरानी को उन सब बातों का पछतावा था? उसकी आत्मग्लानि थी?
आखिर शुरुआत तो उसी नें मेरा लंड चूसनें के साथ की थी| भले ही अनजानें में वो मुझे अपना पति समझ कर पूरी नंगी होकर मेरा लंड चूस चूस कर चाट चाट कर मुझे अपनी चूत मारनें को उकसा रही थी| फिर चुद जानें के बाद अगले दिन जब वो राज खुल ही गया था कि मैंनें! उसके ससुर नें ही उसे चोदा था! उसके बाद भी वो मुझसे कई बार चुदी थी| मेरा लंड हंस हंस कर चूसा था और मेरी आँखों में आँखें डाल के उछल उछल के मेरा लंड अपनी चूत में लिया था|

हो सकता है जवानी के जोश में वो बहक गई हो और यहाँ आनें के बाद जरूर उसनें अपनें किये पर शुरू से आखिर तक सोचा होगा और पछताई भी होगी| इसीलिए मुझसे नज़रें नहीं मिला रही| जरूर यही बात रही होगी|

‘चलो अच्छा ही है’ मैंनें भी मन ही मन सोचा और मुझे राहत भी मिली! आखिर गलत काम करनें का दोषी तो मैं भी था| पहली बार भले ही मेरी कोई गलती नहीं थी लेकिन उसके बाद तो मैंनें जानबूझ कर अपनी कुल वधू को किसी रंडी की तरह अपना लंड चुसवा चुसवा कर तरह तरह के आसनों में उसकी चूत मारी थी|

यही सब सोचते सोचते मैंनें निश्चय कर लिया कि अगर बहूरानी की यही इच्छा है तो जानें दो| ‘जो हुआ सो हुआ’ अब आगे वो सब नहीं करना है| अतः मैंनें बहूरानी की जवानी फिर से भोगनें का विचार त्याग दिया|

शाम हुई तो मैं बाहर जा के मार्केट का चक्कर लगा कर साढ़े आठ के करीब लौट आया| बाहर जा के मैंनें मेरे और बहूरानी के रिश्ते के बारे फिर से गहराई से ऐ टू जेड सोचा; मेरे दिल नें भी गवाही दी की ‘जानें दो जो हुआ सो हुआ’| अब जब बहूरानी नज़र उठा के भी नहीं देख रही है तो इसका मतलब एक ही है कि वो उन सब बातों को अब और दोहराना नहीं चाहती|

अब मेरे सामनें बड़ा सवाल ये था कि अभी नौ दस रातें मुझे उसके साथ अकेले घर में गुजारनी हैं तो मुझे अच्छा ससुर! अच्छा केयरिंग पापा बन के दिखाना ही पड़ेगा| मुझे अपनें दिल ओ दिमाग पर पूर्ण नियंत्रण रख के अदिति बहूरानी के साथ अपनी खुद की बेटी के जैसी केयर करनी ही होगी| ये सब बातें सोच के मुझे कुछ तसल्ली मिली|

अब मन को समझानें को कुछ तो चाहिए ही सो मैंनें घर लौटते हुए व्हिस्की का हाफ ले लिया कि चलो खा पी कर सो जाऊंगा; नो फिकर नो टेंशन|

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