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“अपनी सगी कुंवारी बहन की चुदाई की होली के दिन”-5

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अब तक आपनें पढ़ा कि पंकज! रीता और चिंता नें सचिन को अपनी पारिवारिक चुदाई के खेल में शामिल करनें की पूरी योजना बना ली थी| तैयारी भी पूरी थी और सचिन आते ही सबके साथ घुल मिल भी गया था|
अब आगे…

यूँ ही चुहलबाज़ी करते हुए दिन कब बीत गया पता ही नहीं चला| शाम को जब पंकज वापस आया तो तीनों सोफे पर बैठे सनी लिओनी की जिस्म:-2 देख रहे थे| सचिन बीच में बैठा था और उसनें अपनी दोनों बाँहें रीता और चिंता के गले में डाल रखीं थीं| अपनी उंगलियों से वो उनके कंधे सहला रहा था| पंकज को ये देख कर ख़ुशी हुई कि सचिन जल्दी ही इतना घुल मिल गया था| उसनें सोचा! चलो अच्छा है! अब आगे ज़्यादा दिक्कत नहीं होगी| लेकिन सचिन नें जैसे ही देखा कि जीजाजी आ गए हैं उसनें अपनें दोनों हाथ झट से हटा लिए|

पंकज:- अरे इतना टेंशन न ले यार! इस घर में हम शर्म लिहाज़ नाम का जीव पालते ही नहीं हैं| हा हा हा…
चिंता:- हाँ भैया! यही बात हम इसको दिन भर से सिखा रहे हैं लेकिन ये पता नहीं कहाँ कहाँ की तहजीब और अपेक्षाएं पाल कर बैठा है|
सचिन:- अच्छा बाबा गलती हो गई| अब यार! हमारे घर में हमारे माँ:-बाप नें जैसा माहौल बना कर रखा था वैसा ही सीख गए|

पंकज:- यार! माहौल तो हमारे घर भी वही था लेकिन अब हम माँ:-बाप से दूर यहाँ अकेले रह रहे हैं! तो अब तो खुल कर रह ही सकते हैं न| इसीलिए यहाँ तो सब खुलेआम होता है| तुमको कोई समस्या हो तो बता देना! हम वैसा एडजस्ट कर लेंगे|
सचिन:- अरे नहीं नहीं! मुझे तो अच्छा लग रहा है| ज़्यादा सोचनें की ज़रुरत नहीं पड़ रही| जैसे नदी की धारा में बहते चले जा रहा हूँ|
चिंता:- क्या बात है! सचिन तो एक ही दिन में कवि बन गया|

ऐसे ही बातों बातों में समय कब निकल गया पता ही नहीं चला| सबनें खाना भी खा लिया और चिंता नें घोषणा भी कर दी कि वो सोनें जा रही है|

रीता:- तू हमारे कमरे में ही सो जा! सचिन और पंकज तेरे कमरे में सो जाएंगे|
सचिन:- अरे दीदी! रहनें दो मैं यहीं सोफे पर सो जाऊंगा|
चिंता:- भाभी! भैया को क्यों वनवास दे रही हो| मुझे कोई दिक्कत नहीं है सचिन चाहे तो मेरे कमरे में ही सो सकता है|
रीता:- सचिन! तुम चिंता के कमरे में जाओ| पंकज को जहाँ सोना होगा वो अपनें हिसाब से देख लेगा| दोनों ही बेड काफी बड़े हैं|

रीता नें हाथ पकड़ कर चिंता को अपनें साथ ले जाते हुए धीरे से कहा:- सचिन अभी इतना बोल्ड भी नहीं हुआ है| वो तुम्हारे साथ सोनें को तैयार नहीं होगा और यहीं सो जाएगा फिर हमको प्लान आगे बढ़ाना और मुश्किल होगा|
चिंता:- हम्म… ठीक है अभी आपके साथ ही चलती हूँ! फिर बाद में देखेंगे|

रीता और चिंता बैडरूम में चले गए| उधर पंकज बाथरूम से हाथ:-मुँह धो कर वापस आया तो सचिन चिंता के रूम में जा रहा था|

पंकज:- अच्छा तुम चिंता के रूम में सोनें जा रहे हो?
सचिन:- हाँ! चिंता दीदी के साथ सोनें गई है|
पंकज:- ओह्ह तो मुझे तुम्हारे साथ सोना है|
सचिन:- अरे नहीं आप चाहो तो चिंता को वापस भेज दो! मैंनें तो कहा था मैं सोफे पर सो जाऊंगा|
पंकज:- अरे नहीं नहीं… ऐसा कैसे? तुम आराम से बेड पर ही सोओ मैं देख लूँगा जो भी होगा|

पंकज के ज़ोर देनें पर सचिन चिंता के बेड पर ही सो गया| ये डबल:-बेड ज़रूर था लेकिन उतना बड़ा भी नहीं जितना बैडरूम वाला बेड था| पंकज भी दूसरा कोना पकड़ कर लेट गया| कुछ देर तक दोनों नें इधर उधर की बातें कीं और फिर सो गए| सचिन को तो अभी नींद नहीं आ रही थी| एक तो वो अपनें घर से बाहर कम ही जाता था तो किसी नई जगह पर नींद मुश्किल से ही आती थी! उस पर आज दिन भर में जो कुछ भी हुआ था वो सब उसके दिमाग में घूम रहा था.
अधिकतर वो चिंता के बारे में ही सोच रहा था ‘चिंता कितनी बोल्ड लड़की है न! दीदी भी इतनी बोल्ड होतीं तो पता नहीं शायद हमारे बीच कुछ हो गया होता| जीजाजी बोल रहे थे कि वो कोई लिहाज़ नहीं मानते! कहीं सच में उनका कोई चक्कर तो नहीं हो चिंता के साथ? अरे नहीं! ये सब मेरे गंदे दिमाग की उपज है| सब मेरे जैसे अपनी ही बहन पर लट्टू थोड़े ही होते हैं| लेकिन चिंता का मेरे साथ तो चक्कर चल ही सकता है| इसमें तो कोई बुराई नहीं है|’

सचिन इसी सब सोच में डूबा हुआ था कि उसनें देखा की पंकज धीरे से उठा और कमरे से बहार चला गया| पहले तो उसे लगा कि शायद पेशाब करनें गए होंगे लेकिन जब कुछ देर तक कोई हलचल नहीं हुई तो वो समझ गया कि जीजाजी बैडरूम में चले गए हैं| सचिन फिर सोच में पड़ गया कि कहीं उसका शक सही तो नहीं था| कहीं जीजाजी और चिंता… अरे नहीं! वो तो दीदी के लिए गए होंगे| लेकिन चिंता भी तो वहीं है! तो क्या जीजाजी अपनी बहन के सामनें ही दीदी के साथ वो सब करनें लग जाएंगे?

सचिन की उधेड़बुन अभी ख़त्म भी नहीं हुई थी कि उसनें किसी को कमरे में आते देखा| लेकिन ये तो साफ़ था की वो उसके जीजाजी नहीं थे| सचिन की उलझन तुरंत दूर हो गई जैसे ही चिंता बेड पर आ कर बैठी| उसनें एक लम्बा टी:-शर्ट पहना हुआ था जिसके नीचे कुछ भी नहीं था| शायद पैंटी होगी लेकिन वो दिख नहीं रही थी क्योंकि वो टी:-शर्ट इतना लम्बा था कि घुटनो से थोड़ा ही ऊपर तक आ रहा था|

सचिन:- क्या हुआ चिंता तुम यहाँ?
चिंता लेटते हुए:- हाँ यार मुझे तो पहले ही पता था कि भैया! भाभी की बिना नहीं रह पाएंगे|
सचिन:- तो मैं बाहर चला जाता हूँ सोफे पर!
चिंता:- मैं क्या तुमको ड्रैक्युला जैसी दिखती हूँ?
सचिन:- नहीं तो!
चिंता:- तो फिर सोए रहो न यार! वैसे भी मुझे तुम्हारे जैसे संस्कारी लड़के से कैसा डर?

सचिन को लगा जैसे किसी नें उसकी शराफत को चुनौती दे दी हो| वैसे उसको पता था कि वो कोई शरीफ नहीं है| जो लड़का अपनी बहन और माँ को नंगी नहाते हुए देख कर मुठ मारता रहा हो वो शरीफ कैसे हो सकता है लेकिन फिर भी जो शराफत की उसकी छवि सब लोगों के मन में बनी हुई थी वो उसको बनें रहनें देना चाहता था| एक रीता ही थी जिसके सामनें वो सच में नंगा था क्योकि उसके आलावा बाकी सब उसे शरीफ ही समझते थे|

आखिर अपनी शराफत की चादर ओढ़ कर सचिन सो गया| नींद में जैसे उसनें कोई सपना देखा हो और उसे लगा कि कोई बिल्ली अचानक उछल कर उसकी कमर पर बैठ गई है| इसी हड़बड़ी में उसकी नींद खुली और उसनें देखा कि चिंता करवट बदलते बदलते उसके बिल्कुल पास आ चुकी थी और उसनें अपना एक पैर मोड़ कर सचिन की कमर पर रख दिया था|

पैर के मुड़नें से उसका लम्बा टी:-शर्ट काफी ऊपर तक सरक गया था और उसकी जांघें यहाँ तक कि उसके कूल्हों का निचला भाग तक नंगा हो गया था| लेकिन यहाँ तक भी पैंटी का कोई नामोनिशान नहीं था|
सचिन का ईमान डगमगा गया और उसनें उसकी जाँघों पर अपना हाथ रख दिया| कुछ देर तक जब कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो सचिन नें चिंता की नंगी जाँघों को सहलाना शुरू कर दिया| इतनी चिकनी और मुलायम त्वचा का अनुभव उसनें शायद अपनी कल्पना में ही किया होगा! या फिर बचपन में कभी! जो वो भूल चूका था|

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इस अनुभव नें उसकी हिम्मत को और बढ़ा दिया और उसनें हाथ आगे बढ़ा कर चिंता के नितम्बों तक ले गया| भरे मुलायम गोल नितम्बों को हलके से मसलते हुए जब उसनें हाथ टी:-शर्ट के अंदर तक डाला तो उसे लगा कि वहां कोई पैंटी नहीं थी| इस बात की पुष्टि जैसे ही हुई उसकी धड़कन और तेज़ हो गई और लंड नें एक और अंगड़ाई झटके के साथ ली| कुछ देर तक वो दोनों नितम्बों को अपनें हाथ से सहलाता रहा लेकिन फिर जब हिम्मत करके उसनें अपन हाथ दोनों के बीच की घाटी में डाला तब समझ आया कि उसनें जी:-स्ट्रिंग पहनी हुई थी जिसमे केवल योनि के ऊपर एक तिकोना कपड़ा होता है! जिसके तीनों छोर पर डोरियां लगी होती हैं|

सचिन नें हिम्मत नहीं हारी! आखिर ये पहली बार था जब वो किसी लड़की के गुप्तांग के इतनें करीब तक पहुंच पाया था| उसनें जी:-स्ट्रिंग के बाजू से दो उँगलियाँ अंदर सरका कर चिंता के भग:-प्रदेश को छुआ ही था कि अचानक चिंता नें करवट बदल ली और अपना टी:-शर्ट नीचे करके चादर ओढ़ कर सो गई| सचिन की धड़कन अभी भी रेलगाड़ी की तरह तेज़ दौड़ रही थी| उसकी उँगलियों नें जिस अहसास को अभी अभी अनुभव किया था वो अभी भी ताज़ा था| पूरी रात वो करवटें बदलता रहा लेकिन नींद नहीं आई|

आखिर भोर के पहले पहर नें उसे सुला ही दिया|

अगली सुबह वो काफी देर से उठा तब तक पंकज जा चुका था और रीता व चिंता फ्रेश हो कर चाय:-नाश्ता भी कर चुकी थीं| जानें कहाँ से चिंता को पता चल गया और वो उसके लिए कॉफ़ी लेकर आ गई| उसके व्यवहार से ये बिल्कुल नहीं लग रहा था कि उसे रात के बारे में कुछ भी याद है|
सचिन को इस बात से सुकून मिला कि चिंता को कुछ याद नहीं था! वरना वो तो इसी बात से चिंतित था कि कहीं उसे कुछ याद रह गया तो ये जो उनके रिश्ते में थोड़ी नज़दीकियां बनी हैं ये भी कहीं हाथ से निकल न जाएं|

कॉफी पीकर सचिन बहार आया तो रीता नें कहा:- सचिन! नाश्ता लगा दिया है! लेकिन थोड़ा कम ही लेना क्योंकि इतना देर से उठे हो कि खानें का समय भी बस हो ही गया है| नाश्ता करके नहा लेना! फिर सब साथ में खाना खाएंगे|
सचिन:- जी दीदी!

नाश्ता करके सचिन घर में इधर उधर टहलनें लगा| चिंता नें अब एक दूसरी ड्रेस पहन ली थी जो उस रात वाले टी:-शर्ट से कोई बहुत अलग नहीं थी| फर्क इतना था कि ये थोड़ी कसी हुई थी और इस पर ऊपर से नीचे तक काली और सफ़ेद पट्टियां थीं|

एक बात और! ये घुटनों से काफी ऊपर भी थी और इसकी बाँहें कलाइयों तक पूरी ढकी हुई थीं| चिंता बहुत सेक्सी लग रही थी इसमें| सचिन नें तो ऐसी ड्रेस पहनें केवल 1:-2 लड़कियों को ही देखा था वो भी कॉलेज की पार्टी में| सचिन की तो उनसे कभी बात तक करनें की हिम्मत नहीं हुई थी|

खाना लगभग तैयार था इसलिए रीता नें सचिन को जल्दी से जा कर नहानें के लिए कहा तो वो नहानें चला गया|
अभी ठीक से नहाना शुरू भी नहीं किया था कि उसे किसी के आनें की आहट सुनाई दी|

चिंता:- बड़ी जल्दी सारा सिस्टम समझ गए सचिन! मैं तो डर गई थी कि कहीं आज भी घंटा भर रोक के न रखना पड़े|

सचिन को कमोड का ढक्कन खोलनें की आवाज़ आई और साथ में ये ख्याल भी कि पर्दा तो शावर में लगा है कमोड तो खुले में है| तब तक चिंता के पेशाब करनें की आवाज़ भी आनें लगी थी| शस्स्स्सऽऽऽ…
उसनें हिम्मत करके स्लाइडिंग दरवाज़े को थोड़ा खोला और परदे के किनारे से आँख लगा कर बाहर देखा| ठीक सामनें चिंता कमोड पर बैठ कर पेशाब करती हुई दिखाई दी| उसकी ड्रेस नाभि से ऊपर तक उठी हुई थी! ज़ाहिर है कोई पैंटी नहीं थी और चूत बिल्कुल चिकनी… सचिन के मन में रात वाली कोमल अनुभूति ताज़ा हो गई| लेकिन छूनें और देखनें दोनों की अपनी अलग अनुभूति होती है|

वो डबलरोटी के बन की तरह फूले और आपस में चिपके दो चिकनें भगोष्ठ! उनके बीच से बाहर झांकती छोटी सी भगनासा (क्लिट)| उसके नीचे से निकलती पानी की धार… हाँ वो पीली बिल्कुल नहीं थी| बिल्कुल पानी की तरह साफ पेशाब की धार जो सीधा कमोड में गिर रही थी|

सचिन नें सोचा था कि पैंटी शायद नीचे पैरों में फंसी होगी लेकिन वो वहां भी नहीं थी| मतलब आज चिंता नें कोई पैंटी पहनी ही नहीं थी?

इसका जवाब भी जल्दी ही मिल गया| चिंता नें बाजू से एक टिश्यू लेकर अपनी चूत को साफ़ किया और खड़ी हो गई| कमोड को बंद करके वो सिंक के पास गई और वहां से अपनी पैंटी (जी:-स्ट्रिंग) उठाई| वो उसे पहननें के लिए झुकी लेकिन फिर रुक गई! वापस खड़े हो कर उसनें उसे सूंघा और फिर वहीं प्लेटफॉर्म पर रख दिया और खुद को आइनें में निहारनें लगी|
उसकी वो ड्रेस जो अब तक उसकी नाभि के ऊपर तक चढ़ी हुई थी! उसे नीचे करनें की बजाए उसनें उसे अब बाहों तक ऊपर चढ़ा लिया| उसके ऐसा करते ही उसके दोनों कबूतर आज़ाद पंछी की तरह फड़फड़ा कर बाहर आ गए|

चिंता नें अपनें स्तनों को दोनों हाथों में भर कर सहलाया! थोड़ा दबाया और खेल खेल में उनके चुचूक उमेठ कर खींचे भी| इसी बीच वो अपनी कमर भी हल्के से लहरानें लगी जैसे किसी हल्की सी धुन पर नाच रही हो और इससे सचिन का ध्यान अपनें आप ही उसके नितम्बों की ओर चला गया! ऐसे लग रहे थे जैसे रेगिस्तान में तूफ़ान के बाद रेत के स्तूप बन गए हों! एकदम सुडौल और बेदाग|

अचानक उसकी कमर पेंडुलम की तरह दाएं:-बाएं हिलते हिलते! एक ओर रुक गई और जब सचिन की नज़र ऊपर गई तो उसे लगा जैसे चिंता दर्पण में से उसी की तरफ देख रही थी| चिंता नें एक आँख मारी और मुस्कुरा दी|
सचिन घबरा कर जल्दी से पर्दा छोड़ दिया और स्लाइडर बंद कर लिया|

इस घटना से सचिन बहुत उत्तेजित हो गया था और रात वाली बात उसकी उत्तेजना को और बढ़ा रही थी| आखिर उससे रहा नहीं गया और उसनें चिंता की कल्पना करते हुआ मुठ मारना शुरू कर दिया| उसे पक्का यकीन नहीं था कि चिंता नें वो आँख उसे देख कर ही मारी थी या वो दर्पण में खुद को देख कर ऐसा कर रही थी लेकिन फिर भी उसका दिल यही चाहता था कि काश वो इशारा उस ही के लिए हो| आज बहुत दिनों के बाद मुठ मारनें में उसे इतना मजा आया था|

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